विस्तृत उत्तर
माता सती का यज्ञकुंड में अपने प्राण त्यागना हिंदू पुराणों का सर्वाधिक मार्मिक और गहन प्रसंगों में से एक है।
शिव पुराण और देवी भागवत के अनुसार जब सती यज्ञ में पहुँची तो दक्ष ने न केवल उनके पति शिव का अपमान किया, बल्कि सती के साथ भी दुर्व्यवहार किया। सती का सबसे बड़ा आघात यह था कि यज्ञ में भगवान शिव के लिए कोई भाग नहीं रखा गया था — यह उनके पति का सुनियोजित तिरस्कार था।
सती ने यज्ञ में उपस्थित शिव भक्तों और देवताओं से आग्रह किया कि वे दक्ष को दंड दें, परंतु कोई नहीं उठा। अपने पिता द्वारा पति का इस प्रकार अपमान सुनकर, यज्ञ में शिव का भाग न देखकर और अपने चारों ओर मौन समर्थन देखकर सती का हृदय टूट गया। उन्होंने सोचा — 'यह शरीर जो मेरे पिता ने दिया है, इसी शरीर ने मेरे पति का अपमान सहा है। मैं इस शरीर को वापस लौटाती हूँ।'
सती ने दक्ष को श्राप दिया कि उनके दंभ और अहंकार का परिणाम भोगना होगा। फिर उन्होंने योगाग्नि प्रज्वलित की और यज्ञकुंड में स्वयं को अर्पित कर दिया। यह आत्मदाह पति की निंदा और अपमान के विरुद्ध एक पत्नी का सर्वोच्च प्रतिकार था। सती के शव के अंग जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ 51 शक्तिपीठों की स्थापना हुई।





