विस्तृत उत्तर
शिव जी के तीसरे नेत्र की उत्पत्ति के संदर्भ में दो प्रमुख पौराणिक कथाएँ मिलती हैं।
पहली कथा महाभारत के अनुशासन पर्व में है, जिसे शिव पुराण में भी स्थान मिला है। एक समय भगवान शिव हिमालय पर देवताओं, ऋषियों और गणों के साथ विराजमान थे। माता पार्वती ने पीछे से आकर प्रेम और हास-परिहास में शिव जी की दोनों आँखें अपनी हथेलियों से ढक दीं। शिव जी की एक आँख सूर्य और दूसरी चंद्रमा का प्रतीक है, इसलिए जैसे ही आँखें बंद हुईं, समस्त सृष्टि में घोर अंधकार छा गया। प्राणियों में हाहाकार मच गया। यह स्थिति देखकर शिव जी ने अपनी दिव्य शक्ति से अपने मस्तक पर एक तेजस्वी तीसरी आँख प्रकट की, जिसके प्रकाश से पुनः सृष्टि आलोकित हो गई। किंतु उस अग्नि की तीव्रता से हिमालय जलने लगा, तब घबराकर माता पार्वती ने अपने हाथ हटा लिए। तभी से शिव त्रिनेत्रधारी और 'त्रिलोचन' कहलाए।
दूसरी कथा कामदेव दहन से जुड़ी है। सती के हवन कुंड में जलने के बाद शिव गहन ध्यान में थे। तारकासुर का वध केवल शिव-पुत्र से संभव था। देवताओं ने शिव की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव ने पुष्प-बाण चलाया। इससे क्रुद्ध शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोला और कामदेव भस्म हो गए।
दोनों कथाओं का सार यह है कि शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान, विवेक और संहार शक्ति का प्रतीक है।





