विस्तृत उत्तर
शिव जी की जटाओं में गंगा का आना एक अत्यंत पावन पौराणिक कथा है जो गंगा अवतरण की महागाथा का केंद्रबिंदु है।
प्राचीन काल में राजा सगर के साठ हजार पुत्र अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा खोजते-खोजते कपिल मुनि के आश्रम पहुँचे और उनकी तपस्या भंग कर दी। कपिल मुनि के क्रोध से वे सभी भस्म हो गए। उनकी आत्माओं की मुक्ति के लिए गंगाजल की आवश्यकता थी। सगर के कई वंशजों ने तप किया किंतु सफल नहीं हुए। अंत में राजा दिलीप के पुत्र भगीरथ ने घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने गंगा को धरती पर आने की आज्ञा दी।
परंतु गंगा के अपने वेग पर अहंकार था। शिव पुराण के अनुसार गंगा ने सोचा कि वे अपने प्रचंड वेग से शिव को भी बहा ले जाएंगी। यह जानकर भगीरथ भगवान शिव के पास पहुँचे। शिव जी ने प्रसन्न होकर वचन दिया कि वे गंगा के वेग को धारण करेंगे। जब गंगा अहंकार के साथ आकाश से गिरने लगी, शिव जी ने अपनी विशाल जटाएं खोल दीं और गंगा उनकी घनी जटाओं में पूरी तरह उलझ गई। गंगा का अहंकार चूर हुआ। भगीरथ के पुनः विनय करने पर शिव जी ने अपनी जटाओं की एक लट खोली और गंगा की एक धारा पृथ्वी पर उतरी। इसी धारा को 'भागीरथी' कहते हैं। गंगा शिव के स्पर्श से और अधिक पवित्र हो गई और भगीरथ के पूर्वजों को मोक्ष मिला। तभी से शिव जी 'गंगाधर' कहलाए।




