विस्तृत उत्तर
माता सती का बिना आमंत्रण के दक्ष के यज्ञ में जाना एक अत्यंत मार्मिक और शिक्षाप्रद प्रसंग है।
शिव पुराण और रामचरितमानस दोनों में इस कथा का विस्तृत वर्णन है। जब सती को यह ज्ञात हुआ कि उनके पिता दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया है और कैलाश मार्ग से अनेक देवता, यक्ष और गंधर्व अपने विमानों में सवार होकर उस यज्ञ की ओर जा रहे हैं, तो उनके मन में पिता के घर जाने की तीव्र इच्छा जागी।
सती पुत्री थीं — पिता के घर का स्वाभाविक मोह था। अपनी माता, बहनों और बचपन की स्मृतियाँ उन्हें खींच रही थीं। साथ ही उन्हें लगा कि पिता के यज्ञ में उपस्थित न होना अनुचित होगा।
शिव जी ने सती को समझाया — 'जो बिन बुलाए पिता के घर जाता है, उसे वहाँ केवल अपमान मिलता है।' उन्होंने दक्ष के द्वेषभाव की भी चर्चा की। परंतु सती ने तर्क दिया कि पुत्री को पिता के घर जाने के लिए निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती। वे यह सोचकर भी गईं कि शायद दक्ष ने भूलवश आमंत्रण नहीं भेजा हो और वहाँ जाकर सब ठीक हो जाएगा। शिव की मनाही के बावजूद उनकी पुत्री-भावना प्रबल रही और वे यज्ञ में चली गईं।





