विस्तृत उत्तर
भगवान शिव का तीसरा नेत्र सामान्यतः बंद रहता है। यह संहार-शक्ति का प्रतीक है और तब खुलता है जब सृष्टि में अधर्म, अहंकार या भयंकर संकट चरम पर पहुँच जाता है।
शिव पुराण और अन्य पुराणों के अनुसार शिव का तीसरा नेत्र निम्न कारणों से खुला —
कामदेव के तप-भंग पर: जब देवताओं के आग्रह पर कामदेव ने शिव की गहन तपस्या भंग करने के लिए उन पर पुष्प-बाण चलाया, तब क्रोधित शिव का तीसरा नेत्र खुला और उससे निकली अग्नि ने कामदेव को तत्काल भस्म कर दिया। यह प्रसंग बताता है कि काम (वासना) शिव की समाधि को भंग नहीं कर सकती।
सती के आत्मदाह पर: शिव पुराण में उल्लेख है कि जब माता सती ने यज्ञकुंड में अपना प्राण त्यागा, तब भगवान शिव के क्रोध का ठिकाना नहीं रहा और उन्होंने तीसरा नेत्र खोला। इससे समस्त ब्रह्मांड भयभीत हो गया।
त्रिपुरासुर वध के समय: त्रिपुरासुर के वध से पहले शिव जी ने योगमुद्रा में नेत्र बंद किए और जब खोले तो तीसरे नेत्र की शक्ति ने असुर का संहार करने में सहायता की।
प्रतीकात्मक दृष्टि से शिव का तीसरा नेत्र विवेक, आत्मज्ञान और अंतर्दृष्टि का प्रतीक है। यह भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल को देखता है। यह नेत्र अज्ञानता, मोह, काम और अहंकार का नाश करता है।





