विस्तृत उत्तर
भगवान शिव के मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने के पीछे दो प्रमुख पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।
पहली कथा दक्ष प्रजापति के श्राप से जुड़ी है। चंद्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियों से हुआ था, जो 27 नक्षत्रों के रूप में जानी जाती हैं। चंद्रमा रोहिणी से अत्यधिक प्रेम करते थे और शेष 26 पत्नियों की उपेक्षा करते थे। पुत्रियों के दुख से क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग का श्राप दे दिया — अर्थात उनका तेज और आकार क्रमशः घटता जाएगा। श्राप से भयभीत चंद्रमा ने नारद मुनि की सलाह पर शिव की कठोर आराधना की। शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें प्राण बचाए और अपने मस्तक पर स्थान दिया। चूँकि दक्ष का श्राप पूर्णतः निष्फल नहीं किया जा सकता था, इसलिए चंद्रमा 15 दिन (कृष्ण पक्ष) घटते हैं और शिव की कृपा से 15 दिन (शुक्ल पक्ष) बढ़ते हैं। इसीलिए शिव के माथे पर अर्धचंद्र — न कि पूर्ण चंद्र — दिखता है।
दूसरी कथा समुद्र मंथन से संबंधित है। जब शिव जी ने हलाहल विष पिया, तो उस विष की तीव्र गर्मी से उनका शरीर तपने लगा। तब चंद्रमा और देवताओं ने शिव से विनती की कि वे चंद्रमा को मस्तक पर धारण करें ताकि उनकी शीतलता से विष का ताप कम हो। देवताओं के आग्रह पर शिव ने चंद्रमा को अपने सिर पर स्थान दिया और तभी से वे 'चंद्रशेखर' कहलाए।





