विस्तृत उत्तर
भगवान शिव के शरीर पर भस्म धारण करने के पीछे कई गहरे पौराणिक और आध्यात्मिक कारण हैं।
सबसे प्रचलित मान्यता यह है कि शिव जी मृत्यु के स्वामी हैं। 'शव' से 'शिव' नाम बना। वे चिताभस्म — अर्थात मृत शरीर के जलने के बाद बची राख — अपने शरीर पर धारण करते हैं। इससे वे समस्त प्राणियों को यह संदेश देते हैं कि यह शरीर नश्वर है और एक दिन इसी भस्म की तरह राख हो जाएगा। इसलिए देह के अहंकार में नहीं रहना चाहिए।
एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार जब माता सती ने दक्ष के यज्ञ में योगाग्नि से स्वयं को भस्म किया, तो शिव जी सती के वियोग में अत्यंत व्याकुल हो गए। भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शव को भस्म कर दिया। उस भस्म को अपने हाथों में देखकर शिव जी ने सती की याद में वह राख अपने पूरे शरीर पर लगा ली — इस प्रकार उन्होंने सती को स्वयं में समाहित कर लिया।
भस्म के अर्थ पर विचार करें तो 'भ' का अर्थ है 'भत्सर्नम' यानी नाश करना और 'स्म' का अर्थ है पापों का स्मरण करके उन्हें नष्ट करना। इस प्रकार भस्म पाप-नाशक और मोक्षदायी मानी जाती है। भस्म का एक व्यावहारिक महत्व भी है — यह रोम-छिद्रों को बंद करती है, गर्मी-सर्दी से रक्षा करती है और त्वचा रोगों में औषधि का काम करती है, जो कैलाश के प्रतिकूल वातावरण में उपयोगी था।




