विस्तृत उत्तर
ब्रह्माजी का पाँचवाँ सिर काटने का कार्य भैरव ने किया था, परंतु यह कृत्य शिव के आदेश और उनकी शक्ति से हुआ था — इसलिए इस हत्या का दोष शिव अवतार भैरव पर लगा।
शास्त्रों में ब्रह्महत्या को महापातक माना गया है — ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हैं और उनके किसी भी अंश की हत्या महापाप की श्रेणी में आती है। यद्यपि शिव स्वयं परब्रह्म हैं और उन पर पाप का प्रभाव नहीं पड़ सकता, तथापि यह घटना लोक-शिक्षा के लिए हुई — ताकि संसार को यह संदेश मिले कि ब्रह्महत्या का दोष देवताओं पर भी लग सकता है और प्रायश्चित अनिवार्य है।
इसलिए भैरव स्वरूप में शिव को ब्रह्महत्या का दोष लगा। ब्रह्माजी का कपाल (कटा सिर) उनके हाथ से चिपक गया और उन्हें भिक्षाटन करना पड़ा। वे ब्रह्मा का कपाल हाथ में लेकर भिक्षापात्र की तरह लिए तीनों लोकों के तीर्थों में भटकते रहे — पर वह कपाल हाथ से छूटा नहीं।
जब वे काशी पहुँचे, तो वहाँ प्रवेश करते ही उनके हाथ से वह कपाल गिर गया और उन्हें ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली। उस स्थान को 'कपाल मोचन' तीर्थ कहते हैं। तभी से भैरव काशी के कोतवाल बने और काशी मोक्षदायिनी नगरी कहलाई।




