विस्तृत उत्तर
यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसका उत्तर शास्त्रों में कई संदर्भों से मिलता है।
भगवान शिव को 'महाकाल' और मृत्युंजय कहा गया है। वे श्मशान के स्वामी हैं और चिताभस्म उन्हें अत्यंत प्रिय है। शास्त्रों के अनुसार शिव जी मुख्यतः चिता की राख — यानी मृत शरीर के जलने के बाद बची भस्म — अपने शरीर पर धारण करते हैं। यह भस्म श्मशान से प्राप्त होती है। इसीलिए शिव जी को श्मशानवासी भी कहा गया है।
पौराणिक कथाओं में माता सती की भस्म का भी उल्लेख है। जब भगवान विष्णु ने सती के शव को भस्म किया, तो शिव जी ने उसी राख को अपने शरीर पर लगाया था।
उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में प्रतिदिन प्रातः होने वाली 'भस्म आरती' इस परंपरा का जीवंत प्रमाण है। इस आरती में चिता की राख से शिवलिंग का शृंगार किया जाता है। यह परंपरा अत्यंत प्राचीन है।
आगम शास्त्र और शिव पुराण के अनुसार शिव की पूजा में जो भस्म अर्पित की जाती है वह यज्ञ की अग्नि से बनी होनी चाहिए — गोबर के उपले, पलाश की समिधा या अन्य पवित्र द्रव्यों को जलाकर बनाई भस्म श्रेष्ठ मानी गई है। साधारण लोगों के लिए गोमय (गाय के गोबर) से बनी भस्म उपयुक्त बताई गई है।





