विस्तृत उत्तर
शिव पुराण में भस्म को अत्यंत पवित्र और शिव का साक्षात स्वरूप बताया गया है। पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि भस्म को लगाने से कष्टों और पापों का नाश होता है और यह शुभफलदायी है।
भस्म को 'विभूति' भी कहते हैं। शिव पुराण के अनुसार भस्म लगाने का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि यह हमें जीवन की नश्वरता का स्मरण कराती है। मनुष्य देह नाशवान है और मृत्यु के बाद राख बनना है — यह भस्म हमें यही संदेश देती है कि देह पर घमंड व्यर्थ है।
शिव पुराण में भस्म को तीन रेखाओं में ललाट पर लगाने का विधान है, जिसे 'त्रिपुंड्र' कहते हैं। मध्यमा और अनामिका उंगली से बाईं ओर से दाईं ओर तीन रेखाएं खींची जाती हैं। त्रिपुंड्र के बीच में एक बिंदु भी लगाया जाता है। यह त्रिपुंड्र ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक है और सुषुम्ना नाड़ी को जागृत करने में सहायक माना गया है।
शिव पुराण के अनुसार यज्ञ में समिधा और घी की आहुति से जो भस्म बनती है, वह सर्वश्रेष्ठ होती है। देवतापूजन से पवित्र बनी राख भी 'भस्म' के रूप में ग्रहण योग्य है। चिताभस्म शिव को सर्वाधिक प्रिय है, परंतु सामान्य जनों के लिए गोबर जलाकर बनाई गई भस्म का उपयोग उचित बताया गया है। भस्म धारण करने वाले को मंत्र-तंत्र, नकारात्मक शक्तियों से भी रक्षा मिलती है।




