विस्तृत उत्तर
समुद्र मंथन के हलाहल-प्रसंग में जब शिव जी के गले का रंग नीला पड़ा और वे 'नीलकंठ' कहलाए, तब समस्त देवताओं ने भाव-विह्वल होकर उनकी स्तुति की।
भागवत पुराण और शिव पुराण में इस स्तुति का वर्णन मिलता है। देवताओं ने शिव की प्रशंसा में कहा कि यह लोककल्याण की सर्वोच्च मिसाल है। उन्होंने कहा — 'हे प्रभो! जब सम्पूर्ण देव-दानव और ऋषि-मुनि सृष्टि को बचाने में असमर्थ थे, तब आपने स्वयं इस विष को पीकर समस्त जीवों की रक्षा की। आप ही सच्चे सर्वस्व-त्यागी और लोककल्याणी महादेव हैं।'
देवताओं ने शिव को 'नीलकंठ', 'विषधर', 'महाकाल', 'त्रिनेत्र', 'पशुपति', 'जगत्पति' और 'भवानीपति' आदि नामों से स्तुति की। उन्होंने कहा कि जो देव अमृत के लिए प्रयास करते हैं, वे शिव उस अमृत को भी अस्वीकार करके विष ग्रहण करते हैं — यह परोपकार की पराकाष्ठा है। माता पार्वती द्वारा कंठ दबाए जाने पर शिव जी की जो स्थिति बनी, उसे देखकर देवताओं के मन में अत्यंत करुणा और श्रद्धा का भाव जागा। उन्होंने पुष्प-वर्षा की और जय-जयकार किया। शिव जी की इस लीला से शिवलिंग पर जलाभिषेक करने की परंपरा प्रारंभ हुई — विष की ज्वाला को शांत करने के प्रतीक स्वरूप।





