विस्तृत उत्तर
समुद्र मंथन में भगवान शिव की भूमिका सबसे अद्वितीय, सबसे त्यागमय और सबसे महत्वपूर्ण थी।
समुद्र मंथन में देव और असुर दोनों ने भाग लिया था, भगवान विष्णु ने कच्छप रूप धारण कर मंदराचल को संभाला और मोहिनी रूप धारण कर अंत में अमृत वितरण किया। परंतु शिव जी की भूमिका इन सबसे पूर्णतः भिन्न और अतुलनीय थी।
समुद्र मंथन के प्रारंभ में जब कालकूट हलाहल विष निकला और उसकी भीषण ज्वाला से सम्पूर्ण सृष्टि संकटग्रस्त हुई, तब शिव जी ने — जिन्हें मंथन में सम्मिलित नहीं किया गया था — स्वयं आगे बढ़कर उस विष को अपने कंठ में धारण किया। जहाँ देवता अमृत के लिए मंथन कर रहे थे, वहाँ शिव ने विष पीया। यह उनकी महानता का अद्वितीय प्रमाण है।
शिव ने न अमृत माँगा, न किसी रत्न की कामना की — उन्होंने केवल सृष्टि की रक्षा के लिए स्वयं विष का पात्र बने। माता पार्वती ने उनके कंठ को दबाकर विष को उदर में जाने से रोका, जिससे वे 'नीलकंठ' कहलाए। इस प्रकार शिव की भूमिका समुद्र मंथन में सबसे अधिक उदात्त, परोपकारी और बलिदानमय थी। वे समुद्र मंथन के वास्तविक नायक हैं क्योंकि उनके बिना वह मंथन सृष्टि के विनाश का कारण बन जाता।





