विस्तृत उत्तर
समुद्र मंथन की यह महागाथा भागवत पुराण, विष्णु पुराण और महाभारत में विस्तार से वर्णित है।
प्राचीन काल में देवताओं को ऋषि दुर्वासा के श्राप से शक्ति-हीनता प्राप्त हुई थी। भगवान विष्णु की सलाह पर उन्होंने असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर (दूध का समुद्र) का मंथन करने का निश्चय किया ताकि उससे निकलने वाले अमृत को पीकर अमरत्व प्राप्त किया जा सके। मंदराचल पर्वत को मथनी और नागराज वासुकी को रस्सी बनाया गया। भगवान विष्णु ने कच्छप रूप धारण कर मंदराचल को अपनी पीठ पर धारण किया। देवताओं ने वासुकी की पूँछ और असुरों ने सिर पकड़कर मंथन प्रारंभ किया।
जैसे ही मंथन शुरू हुआ, समुद्र की गहराई से सबसे पहले कालकूट नामक हलाहल विष निकला — इसे हलाहल भी कहते हैं। यह विष इतना भयंकर और प्राणघातक था कि इसकी एक बूँद भी सम्पूर्ण ब्रह्मांड को नष्ट करने में सक्षम थी। विष की भीषण ज्वाला से देव, दानव और सम्पूर्ण सृष्टि के प्राणी मूर्छित होने लगे और मंथन का कार्य ठप हो गया। न देवता इसे ग्रहण करना चाहते थे, न असुर। सभी भयभीत होकर भगवान शिव की शरण में गए।





