विस्तृत उत्तर
भगवान शिव के बाघ की खाल पहनने के पीछे शिव पुराण में एक रोचक कथा मिलती है, साथ ही एक अन्य शैव परंपरा की कथा भी प्रचलित है।
शिव पुराण की प्रमुख कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव दिगंबर रूप में (वस्त्रहीन) भिक्षाटन करते हुए दारुकवन (देवदारु वन) से गुजर रहे थे। उस वन में अनेक ऋषि-मुनि अपने परिवारों के साथ निवास करते थे। शिव जी के अद्भुत रूप को देखकर ऋषियों की पत्नियाँ मुग्ध हो गईं और अपने कार्य छोड़कर उनकी ओर आकृष्ट होने लगीं। ऋषियों को यह बात अच्छी नहीं लगी और वे क्रोधित हो गए। उन्होंने तांत्रिक विद्या से एक गड्ढा खोदकर उसमें एक भयानक बाघ उत्पन्न किया और उसे शिव पर छोड़ दिया। परंतु शिव जी ने उस बाघ को अपने नाखूनों से क्षण भर में मार डाला और उसकी खाल उतारकर अपने शरीर पर लपेट ली। यह देखकर ऋषि समझ गए कि यह कोई साधारण पुरुष नहीं, साक्षात् महेश्वर हैं। तभी से शिव जी बाघ की खाल धारण करते हैं।
एक अन्य शैव मत की कथा के अनुसार नरसिंह अवतार के क्रोध को शांत करने के लिए शिव ने शरभ रूप धारण किया। युद्ध के बाद नरसिंह ने विनती की कि शिव उनके चर्म को अपना आसन स्वीकार करें। शिव ने यह मान लिया।
प्रतीकात्मक दृष्टि से बाघ अहंकार, वासना और शक्ति का प्रतीक है। शिव का उस पर विराजमान होना यह दर्शाता है कि उन्होंने इन पर पूर्ण विजय प्राप्त की है।



