विस्तृत उत्तर
त्रिपुरासुर वध के लिए भगवान शिव को एक ऐसे असाधारण रथ और बाण की आवश्यकता थी जो वरदान की शर्त के अनुसार 'असंभव' हो। इसलिए देवताओं ने मिलकर एक दिव्य ब्रह्मांडीय रथ का निर्माण किया।
पुराणों में इस रथ की संरचना का विस्तृत वर्णन इस प्रकार है — पृथ्वी स्वयं रथ का मंच (आधार) बनी। सूर्य और चंद्रमा उस रथ के दो पहिए बने। पर्वतराज मेरु शिव का धनुष बना। शेषनाग अथवा वासुकी नाग उस धनुष की डोर (प्रत्यंचा) बने। भगवान विष्णु स्वयं उस धनुष का बाण बने — अग्नि उस बाण की नोक बनी और वायु उसके पंख। सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी स्वयं शिव के रथ के सारथी बने।
जब शिव जी उस महान रथ पर आरूढ़ हुए, तब उनके असीम तेज और भार से रथ डगमगाने लगा — सभी देवताओं की मिली-जुली शक्ति भी उसे संभालने में असमर्थ रही। तब भगवान विष्णु वृषभ (बैल) का रूप धारण करके रथ में जुड़ गए, जिससे रथ स्थिर हुआ।
कार्तिक पूर्णिमा को जब अभिजित नक्षत्र में तीनों नगर एक पंक्ति में आए, तब शांतचित्त शिव ने पाशुपत अस्त्र का संधान किया और एक ही बाण से तीनों पुरों को जलाकर भस्म कर दिया। तभी से शिव 'त्रिपुरारि' और 'त्रिपुरांतक' कहलाए। कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली इसी उत्सव का प्रतीक है।





