विस्तृत उत्तर
शिव का 'कपाली' रूप उनके काल भैरव अवतार का ही एक स्वरूप है जो ब्रह्महत्या के प्रायश्चित और काशी के कोतवाल पद से जुड़ा है।
शिव पुराण और स्कंद पुराण के काशी-खंड में इस रूप का विस्तृत वर्णन मिलता है। जब काल भैरव ने ब्रह्माजी का पाँचवाँ सिर काटा, तो वह कपाल (खोपड़ी) उनके हाथ में चिपक गई — यह ब्रह्महत्या के दोष का प्रतीक था। उस कपाल को हाथ में लिए, काले वस्त्र पहने, डमरू और त्रिशूल धारण किए, काले कुत्ते को अपना वाहन बनाए भैरव तीनों लोकों में भिक्षाटन करने लगे।
यही उनका 'कपाली' स्वरूप है — जो कपाल (खोपड़ी) धारण करने वाले शिव हैं। कपाली रूप यह सिखाता है कि सर्वोच्च शक्ति होने के बावजूद शिव लोक-शिक्षा के लिए प्रायश्चित करते हैं — यह उनकी महानता का प्रमाण है।
तीर्थाटन के क्रम में जब भैरव काशी पहुँचे, तो उनके हाथ से कपाल गिर गया और ब्रह्महत्या का पाप धुल गया। तभी से शिव ने काशी में 'कपाल मोचन' नामक तीर्थ स्थापित किया और भैरव को काशी का कोतवाल नियुक्त किया। आज भी काशी यात्रा में काल भैरव के दर्शन के बिना विश्वनाथ का दर्शन अधूरा माना जाता है।




