विस्तृत उत्तर
भगवान शिव के गले का नीला पड़ जाना हलाहल विष के असाधारण रासायनिक और आध्यात्मिक प्रभाव का परिणाम था।
हलाहल — जिसे कालकूट भी कहते हैं — समुद्र की गहराई से निकला वह विष था जो ब्रह्मांड की सर्वाधिक विनाशकारी शक्ति का प्रतीक था। इसमें इतनी तीव्र ऊष्मा और विषाक्तता थी कि सामान्य रूप से यह किसी भी जीव के लिए असहनीय था।
जब शिव जी ने इस विष को पीया और माता पार्वती ने उनके गले को दबाकर उसे कंठ में ही रोक दिया, तो वह विष शिव जी के कंठ में स्थिर हो गया। उस विष की अत्यंत तीव्र उष्मा और विषाक्तता के प्रभाव से शिव जी का कंठ-स्थल नीले रंग का हो गया। जिस प्रकार कुछ जहरीले पदार्थ त्वचा का रंग बदल देते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मांड के इस महाविष ने शिव जी के गले को नीला कर दिया।
तभी से भगवान शिव 'नीलकंठ' के नाम से प्रसिद्ध हुए — 'नील' अर्थात नीला और 'कंठ' अर्थात गला। यह नीला कंठ उनके अद्वितीय त्याग और सृष्टि-रक्षा का चिरस्थायी प्रतीक बन गया। उत्तराखंड में स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर उसी पवित्र स्थान पर है जहाँ शिव जी ने यह विष पिया था। नीलकंठ पक्षी का दर्शन भी इसीलिए शुभ माना जाता है।




