विस्तृत उत्तर
भगवान शिव के गले में लिपटा नाग उनके स्वरूप का एक अभिन्न अंग है। इसके पीछे गहरे पौराणिक कारण और प्रतीकात्मक अर्थ दोनों हैं।
शिव पुराण के अनुसार नागराज वासुकी भगवान शिव के परम भक्त थे। वे सदा शिव की आराधना में लीन रहते थे। समुद्र मंथन के समय जब देवताओं और असुरों को एक रस्सी की आवश्यकता हुई, तब नागराज वासुकी को ही रस्सी के रूप में मंदराचल पर्वत के इर्द-गिर्द लपेटा गया। इस प्रक्रिया में वासुकी का पूरा शरीर लहूलुहान हो गया। समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को शिव जी ने स्वयं पीकर सृष्टि की रक्षा की। वासुकी की इस भक्ति और बलिदान से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें नागलोक का राजा बनाया और अपने गले में आभूषण की भाँति सदा लिपटे रहने का वरदान दिया।
शिव पुराण में एक और संदर्भ भी मिलता है — वासुकी ने समुद्र मंथन से निकले विष के ताप से शिव के गले की जलन को शांत करने का कार्य किया।
प्रतीकात्मक दृष्टि से शिव के गले में नाग यह दर्शाता है कि वे काल के भी स्वामी हैं — नाग काल का प्रतीक है। शिव नाग-नागिन के भी आराध्य देव हैं, जो उनकी सर्व-व्यापक करुणा का प्रमाण है।





