विस्तृत उत्तर
वायवीय संहिता शिव पुराण की सातवीं और अंतिम संहिता है। इसके दो भाग हैं — पूर्व भाग और उत्तर भाग। दोनों भागों में मिलाकर 4,000 श्लोक हैं।
नामकरण — इस संहिता का नाम 'वायवीय' इसलिए है क्योंकि इसमें वायु देव द्वारा प्रवचन दिया गया है। वायु देव ने उपमन्यु आदि ऋषियों को यह ज्ञान प्रदान किया था।
मुख्य विषय — इस संहिता में शिव-तत्व का सर्वोच्च दार्शनिक विवेचन है। यह संहिता शिव-पुराण की ज्ञान-निचोड़ है। इसमें परब्रह्म शिव का अद्वैत स्वरूप, माया, जीव और शिव के परस्पर संबंध, और मोक्ष के विभिन्न मार्गों का गहन विश्लेषण है।
शिव-पुराण का उपसंहार — वायवीय संहिता शिव पुराण का उपसंहारात्मक भाग है जिसमें पूर्व की सभी संहिताओं के सार को दर्शनिक ढंग से प्रतिपादित किया गया है।
पाशुपत दर्शन — इस संहिता में पाशुपत योग और पाशुपत दर्शन का विस्तृत वर्णन है जो शैव दर्शन की सबसे प्राचीन और प्रमाणिक शाखा है।




