विस्तृत उत्तर
भुवर्लोक में बादलों का निर्माण, उनका संचलन और पृथ्वी पर वर्षा कराने वाले बादलों को दिशा प्रदान करने का कार्य वायु देव और उनके सहायक उनंचास मरुत-गणों के द्वारा इसी लोक से संपादित होता है। चूँकि भुवर्लोक मुख्य रूप से वायु-तत्व का क्षेत्र है और वायु देव इसके अधिपति हैं इसलिए इस पूरे लोक का संतुलन और संचालन उन्हीं के अधीन होता है। श्रीमद्भागवत पुराण (५.२४.५) में स्पष्ट बताया गया है कि अंतरिक्ष की भौतिक सीमा वहीं तक मानी गई है जहाँ तक वायु बहती है और जहाँ तक बादल तैरते हुए देखे जा सकते हैं। भुवर्लोक का वातावरण एक ओर तो मेघों और तूफानों से युक्त है वहीं दूसरी ओर यह यज्ञीय हव्य का भी वहन करने वाला पवित्र ब्रह्मांडीय मार्ग है।
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