विस्तृत उत्तर
शिव पुराण की रुद्र संहिता (कुमार खंड, अध्याय 18) में गणेश जी के जन्म की विस्तृत कथा है।
शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव के पास अनेक गण थे जो उनके सभी आदेशों का पालन करते थे, परंतु माता पार्वती के पास अपना कोई गण नहीं था। एक बार माता पार्वती स्नान करने के लिए जा रही थीं। उन्होंने अपने प्रिय नंदी को द्वार पर पहरे के लिए नियुक्त किया। किंतु नंदी शिव का वाहन होने के कारण शिव की आज्ञा को पार्वती की आज्ञा से अधिक मानते थे, इसलिए जब शिव जी आए, तो नंदी ने उन्हें भीतर प्रवेश करा दिया।
इस घटना के बाद माता पार्वती ने निश्चय किया कि उन्हें अपना एक ऐसा विश्वस्त गण चाहिए जो केवल उनकी ही आज्ञा माने। तब उन्होंने अपने शरीर पर लगे उबटन — हल्दी-चंदन के मिश्रण — को उतारा और उससे एक सुंदर बालक की प्रतिमा बनाई। अपनी दिव्य शक्ति से उन्होंने उस मिट्टी की प्रतिमा में प्राण का संचार किया। क्षण भर में वह बालक जीवंत हो उठा — तेजस्वी, सुंदर और शक्तिशाली।
माता पार्वती ने प्रेम से उस बालक को 'गणेश' नाम दिया और सख्त आदेश दिया — 'जब तक मैं स्नान करके बाहर न आऊँ, किसी को भी भीतर प्रवेश मत करने देना।' गणेश जी ने माता की आज्ञा शिरोधार्य की और द्वार पर पहरा देने लगे।





