विस्तृत उत्तर
शास्त्रों के अनुसार शनि देव की 'दृष्टि' में विच्छेदात्मक शक्ति (Destructive power) मानी गई है। ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा में स्पष्ट उल्लेख है कि शनि की दृष्टि पड़ने के कारण ही भगवान गणेश जी का मस्तक उनके धड़ से अलग हुआ था। इसी कारण शास्त्र निर्देश देते हैं कि शनि देव की आँखों में आँखें डालकर दर्शन कभी नहीं करने चाहिए। सदैव उनकी चरण पादुकाओं या चरणों के ही दर्शन करने चाहिए। यदि शनि का विग्रह शिला रूप (जैसे शनि शिंगणापुर) में हो, तो वह सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह निराकार के समीप होता है और उसमें दृष्टि दोष का भय नहीं रहता।





