विस्तृत उत्तर
हाँ, धर्मशास्त्रों के अनुसार घर में जन्म (सूतक) या मृत्यु (पातक) के कारण लगने वाले 'अशौच काल' में भी एकादशी का व्रत नहीं छोड़ना चाहिए। ऐसे समय में व्रती को निराहार या फलाहार रहकर उपवास करना चाहिए, लेकिन भगवान की मूर्ति को छूना वर्जित है। इसके विकल्प के रूप में मानसिक पूजा (मन में जाप) और 'विष्णु सहस्रनाम' सुना जा सकता है। बाद में द्वादशी को इस व्रत का पुण्य पितरों को दान कर देना चाहिए।



