विस्तृत उत्तर
गंगा को 'विष्णुपदी' इसलिए कहते हैं क्योंकि उनकी उत्पत्ति साक्षात् भगवान विष्णु के चरणों के स्पर्श से हुई है। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर बलि की यज्ञशाला में त्रिविक्रम रूप का विस्तार किया था तब उनके वाम चरण (बाएं पैर) के अंगूठे के नख के प्रहार से ब्रह्माण्ड का ऊपरी आवरण छिन्न-भिन्न हो गया था। उस आवरण के छिद्र से ब्रह्माण्ड के बाहर स्थित कारण-जल ब्रह्माण्ड के भीतर प्रविष्ट हुआ। भगवान के साक्षात् चरण-रेणु (चरणों की धूलि) के पवित्र स्पर्श से वह जल गुलाबी आभा से युक्त होकर 'विष्णुपदी' गंगा के रूप में परिणत हो गया। 'विष्णुपदी' का शाब्दिक अर्थ है 'विष्णु के चरणों से उत्पन्न' या 'विष्णु के चरणों से प्रवाहित होने वाली'। यही कारण है कि गंगा को सर्वपापहारिणी और मोक्षदायिनी माना जाता है क्योंकि वे भगवान विष्णु के चरणों से पवित्र हुई हैं।
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