विस्तृत उत्तर
जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर बलि की यज्ञशाला में त्रिविक्रम रूप का विस्तार किया था तब उनके वाम चरण (बाएं पैर) के अंगूठे के नख के प्रहार से ब्रह्माण्ड का ऊपरी आवरण छिन्न-भिन्न हो गया था। उस आवरण के छिद्र से ब्रह्माण्ड के बाहर स्थित कारण-जल (Causal Ocean) ब्रह्माण्ड के भीतर प्रविष्ट हुआ। भगवान के साक्षात् चरण-रेणु (चरणों की धूलि) के पवित्र स्पर्श से वह जल गुलाबी आभा से युक्त होकर 'विष्णुपदी' गंगा के रूप में परिणत हो गया। इसीलिए गंगा को 'विष्णुपदी' कहा जाता है। यह पावन नदी सहस्रों युगों तक स्वर्गीय लोकों में प्रवाहित होने के पश्चात ध्रुवलोक में ध्रुव महाराज के मस्तक पर गिरती है और फिर सप्तर्षि मंडल को पार करते हुए चंद्रलोक से होकर मेरु पर्वत के शिखर पर ब्रह्मा जी की पुरी में अवतरित होती है।
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