पार्वण श्राद्ध की मुख्य विशेषता तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन है। इसमें पिता, पितामह, प्रपितामह और मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह — सब अपनी पत्नियों के साथ आहूत होते हैं। साथ ही विश्वेदेवों यानी पुरूरवा-आर्द्रव या क्रतु-दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है। तीन पिण्ड बनते हैं, जो तीन पीढ़ियों के प्रतीक हैं। यह मुख्यतः पितृ पक्ष में होता है।
सपिण्डीकरण श्राद्ध वह श्राद्ध है जो मृत्यु के बारहवें या तेरहवें दिन किया जाता है, जिसमें मृत व्यक्ति की आत्मा को पितरों के साथ मिलाया जाता है। सपिण्ड का अर्थ है समान पिण्ड वाले बनाना। इसमें चार पिण्ड बनते हैं - एक मृत का और तीन पिता, पितामह, प्रपितामह के। मृत के पिण्ड को तीनों में मिलाकर वह प्रेत-योनि से मुक्त होकर पितृ-योनि में प्रवेश करता है।
वृद्धिश्राद्ध वह श्राद्ध है जो किसी वृद्धि या शुभ अवसर पर पितरों को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। इसे ही नान्दीमुख श्राद्ध भी कहते हैं। यह विवाह, उपनयन यानी जनेऊ, पुत्र-जन्म, गृह-प्रवेश, या यज्ञ से पहले होता है। इसमें हर्ष का भाव प्रबल होता है, और देवताओं का भी आवाहन होता है। पितरों के आशीर्वाद से शुभ कार्य निर्विघ्न सम्पन्न होता है।
नान्दीमुख श्राद्ध वह विशेष श्राद्ध है जो किसी शुभ अवसर पर पितरों को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। नान्दी का अर्थ है आनन्द, और मुख का अर्थ है सम्मुख। इसे वृद्धिश्राद्ध भी कहते हैं। यह विवाह, उपनयन यानी जनेऊ, पुत्र-जन्म, गृह-प्रवेश, या यज्ञ से पहले होता है। इसमें पितरों के साथ देवताओं का भी आवाहन होता है, और भाव शुभ-हर्ष का होता है।
वार्षिक एकोद्दिष्ट हर साल पितर की मृत्यु तिथि पर किया जाता है। यह मृत्यु के ठीक एक वर्ष बाद यानी प्रथम वर्षी से शुरू होकर प्रतिवर्ष उसी मास और उसी तिथि पर लगातार किया जाता है। यदि मृत्यु ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को हुई थी, तो प्रतिवर्ष ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को ही श्राद्ध होगा। यह वंशज का स्थायी आजीवन कर्तव्य है।
एकोद्दिष्ट श्राद्ध में केवल एक पिण्ड बनता है। यह पिण्ड उसी एक मृत व्यक्ति यानी उद्देश्य के लिए होता है, जिसकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध हो रहा है। पार्वण श्राद्ध में जहाँ तीन पीढ़ियों के लिए तीन पिण्ड बनते हैं, वहाँ एकोद्दिष्ट में केवल एक पिण्ड का ही दान होता है। पिण्ड सत्तू, काले तिल, घृत और मधु से बनाया जाता है।
क्षयाह श्राद्ध वह वार्षिक श्राद्ध है जो किसी पितर की मृत्यु तिथि पर हर वर्ष किया जाता है। क्षय का अर्थ है मृत्यु और अह का अर्थ है दिन, यानी मृत्यु का दिन। यह एकोद्दिष्ट श्राद्ध का ही दूसरा नाम है। यदि मृत्यु द्वितीया को हुई थी, तो प्रतिवर्ष द्वितीया को क्षयाह होगा। इसमें केवल एक पिण्ड का दान होता है, और तीन पीढ़ियों का आवाहन नहीं होता।
एकोद्दिष्ट श्राद्ध वह श्राद्ध है जो किसी एक विशेष पितर को उद्दिष्ट करके प्रतिवर्ष उसकी मृत्यु तिथि पर किया जाता है। इसे क्षयाह श्राद्ध भी कहते हैं, क्योंकि यह क्षय यानी मृत्यु के दिन पर होता है। इसमें केवल उसी एक मृत व्यक्ति के लिए एक पिण्ड का दान होता है, और तीन पीढ़ियों का आवाहन नहीं होता। यह उसी मास की उसी तिथि पर हर साल होता है।
श्राद्ध के मुख्य चार भेद हैं — पार्वण, एकोद्दिष्ट, नान्दीमुख यानी वृद्धिश्राद्ध, और सपिण्डीकरण। पार्वण श्राद्ध तीन पीढ़ियों का सामूहिक आवाहन वाला, एकोद्दिष्ट एक पितर के लिए वार्षिक क्षयाह, नान्दीमुख शुभ अवसरों पर वृद्धि के लिए, और सपिण्डीकरण मृत्यु के बाद आत्मा को पितरों में मिलाने के लिए। द्वितीया पर पार्वण और एकोद्दिष्ट दोनों होते हैं।