विस्तृत उत्तर
एकोद्दिष्ट श्राद्ध वह श्राद्ध है जो किसी एक विशेष पितर को उद्दिष्ट करके प्रतिवर्ष उसकी मृत्यु तिथि पर किया जाता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार यदि किसी परिजन की मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई हो, तो उसकी मृत्यु के ठीक एक वर्ष पश्चात् और उसके बाद प्रतिवर्ष उसी द्वितीया तिथि को जो श्राद्ध किया जाता है, वह एकोद्दिष्ट श्राद्ध कहलाता है। इसमें केवल उसी एक मृत व्यक्ति यानी उद्देश्य के लिए एक पिण्ड का दान किया जाता है।
एकोद्दिष्ट का शाब्दिक अर्थ देखें तो एक का अर्थ है एक, और उद्दिष्ट का अर्थ है उद्देश्य या लक्ष्य। एकोद्दिष्ट यानी एक उद्देश्य वाला, अर्थात् केवल एक पितर के लिए किया गया श्राद्ध। यह नाम ही इस श्राद्ध की मूल विशेषता को दर्शाता है।
एकोद्दिष्ट को क्षयाह श्राद्ध भी कहते हैं। क्षय का अर्थ है मृत्यु, और अह का अर्थ है दिन। क्षयाह यानी मृत्यु का दिन। चूँकि यह श्राद्ध मृत्यु तिथि पर होता है, इसलिए इसे क्षयाह श्राद्ध भी कहा जाता है।
एकोद्दिष्ट श्राद्ध की पाँच मुख्य विशेषताएँ हैं। पहली विशेषता है केवल एक पितर का आवाहन। इसमें केवल उसी एक मृत व्यक्ति का आवाहन होता है, जिसकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध हो रहा है। तीन पीढ़ियों का आवाहन नहीं होता। दूसरी विशेषता है केवल एक पिण्ड का दान। पार्वण श्राद्ध में तीन पिण्ड बनते हैं, परंतु एकोद्दिष्ट में केवल एक पिण्ड बनाया जाता है। यह पिण्ड उसी एक पितर के लिए होता है।
तीसरी विशेषता है मृत्यु तिथि पर श्राद्ध। एकोद्दिष्ट हमेशा मृत्यु तिथि पर ही होता है। यदि मृत्यु द्वितीया को हुई थी, तो प्रतिवर्ष द्वितीया को ही श्राद्ध होगा। तिथि बदली नहीं जा सकती। चौथी विशेषता है हर साल यानी प्रति वर्ष होना। एकोद्दिष्ट प्रथम वर्ष से शुरू होकर हर वर्ष लगातार किया जाता है। यह वंशज का स्थायी कर्तव्य है। पाँचवीं विशेषता है मास के अनुसार। श्राद्ध उसी मास की द्वितीया को होता है, जिस मास में मृत्यु हुई थी। पूरे साल भर में जब भी द्वितीया आए, उसी की नहीं, बल्कि मृत्यु जिस मास में हुई थी, उस मास की द्वितीया को।
एकोद्दिष्ट और पार्वण का अंतर अत्यंत स्पष्ट है। पार्वण श्राद्ध सामूहिक है, जिसमें तीन पीढ़ियों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह और मातृ पक्ष की तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन होता है। पार्वण में तीन पिण्ड बनते हैं, और विश्वेदेवों की स्थापना अनिवार्य होती है। एकोद्दिष्ट में केवल एक पितर का आवाहन होता है, एक पिण्ड बनता है, और इसमें विश्वेदेवों की स्थापना अनिवार्य नहीं होती।
पितृ पक्ष में नियम विशेष है। श्राद्ध-तत्त्व और धर्मसिन्धु के अनुसार महालय के 16 दिनों यानी पूर्णिमा से अमावस्या तक में किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण विधि से ही होना चाहिए, भले ही मृत्यु की तिथि कोई भी रही हो। इसलिए पितृ पक्ष में एकोद्दिष्ट नहीं, बल्कि पार्वण ही होता है। यदि किसी की मृत्यु द्वितीया को हुई थी, तो पितृ पक्ष की द्वितीया को उसका श्राद्ध पार्वण विधि से होगा, परंतु अन्य महीनों में उसकी मृत्यु तिथि पर एकोद्दिष्ट होगा।
एकोद्दिष्ट के लिए मृत्यु का समय भी मायने रखता है। मृत्यु चाहे दिन में हुई हो अथवा रात्रि में, मृत्यु के समय जो तिथि प्रवृत्त थी, पारलौकिक कर्मकाण्ड के लिए वही तिथि उस जीवात्मा की श्राद्ध तिथि मान ली जाती है। यह नियम एकोद्दिष्ट पर भी लागू होता है।
एकोद्दिष्ट का व्यावहारिक उदाहरण देखें। यदि किसी के पिता की मृत्यु आषाढ़ कृष्ण द्वितीया को हुई थी, तो प्रतिवर्ष आषाढ़ कृष्ण द्वितीया को उनका वार्षिक एकोद्दिष्ट श्राद्ध होगा। मृत्यु के बारह या तेरह दिन बाद सपिण्डीकरण होता है, जिसमें वे पितरों में मिल जाते हैं। फिर एक वर्ष बाद पहली वर्षी पर एकोद्दिष्ट होता है, और उसके बाद प्रतिवर्ष लगातार।
एकोद्दिष्ट का फल भी विशेष है। यह श्राद्ध उस एक पितर की आत्मा को विशेष शान्ति देता है। पितर अपनी मृत्यु तिथि पर वंशज से सीधी अपेक्षा रखते हैं। जब वंशज विधिपूर्वक एकोद्दिष्ट करता है, तो पितर तृप्त होते हैं और वंशज को आशीर्वाद देते हैं।
द्वितीया तिथि पर एकोद्दिष्ट का काम्य फल भी अद्वितीय है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार जो व्यक्ति द्वितीया तिथि को काम्य भावना से पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसे कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद और पशू वै यानी पशु-धन की प्राप्ति होती है। यह फल एकोद्दिष्ट पर भी लागू होता है, यदि वह द्वितीया को हो रहा हो।
एकोद्दिष्ट की विधि भी विशेष है। इसमें पञ्चबलि, अग्नौकरण, पिण्डदान, और ब्राह्मण भोजन सब होते हैं, परंतु पार्वण की तुलना में सरल रूप में। एक पिण्ड कुशा पर रखकर उस पितर के गोत्र और नाम के साथ अर्पित किया जाता है। शास्त्रीय आधार के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, धर्मसिन्धु, श्राद्ध-तत्त्व और गरुड़ पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः एकोद्दिष्ट श्राद्ध वह श्राद्ध है जो किसी एक विशेष पितर को उद्दिष्ट करके प्रतिवर्ष उसकी मृत्यु तिथि पर किया जाता है। इसे क्षयाह श्राद्ध भी कहते हैं, और इसमें केवल एक पिण्ड का दान होता है।
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