विस्तृत उत्तर
श्राद्ध के मुख्य चार भेद पार्वण, एकोद्दिष्ट, नान्दीमुख और सपिण्डीकरण हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार शास्त्रों में श्राद्ध के मुख्य रूप से चार भेद माने गए हैं - पार्वण, एकोद्दिष्ट, नान्दीमुख यानी वृद्धिश्राद्ध और सपिण्डीकरण।
पहला भेद पार्वण श्राद्ध है। यह वह श्राद्ध है जो पर्व यानी विशेष अवसर पर किया जाता है। पितृ पक्ष यानी महालय की प्रत्येक तिथि पर जो श्राद्ध होता है, वह पार्वण विधि से ही होता है। पार्वण श्राद्ध में एक साथ तीन पीढ़ियों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता पक्ष यानी मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह का सतीक यानी पत्नी सहित आवाहन किया जाता है। महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों यानी पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है।
दूसरा भेद एकोद्दिष्ट श्राद्ध है। यह वह श्राद्ध है जो किसी एक विशेष पितर को उद्दिष्ट करके किया जाता है। यदि किसी परिजन की मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई हो, तो उसकी मृत्यु के ठीक एक वर्ष पश्चात् और उसके बाद प्रतिवर्ष उसी द्वितीया तिथि को जो श्राद्ध किया जाता है, वह एकोद्दिष्ट श्राद्ध कहलाता है। इसमें केवल उसी एक मृत व्यक्ति यानी उद्देश्य के लिए एक पिण्ड का दान किया जाता है। इसे क्षयाह श्राद्ध भी कहते हैं, क्योंकि यह क्षय यानी मृत्यु तिथि पर होता है।
तीसरा भेद नान्दीमुख श्राद्ध है। इसे वृद्धिश्राद्ध भी कहते हैं। यह वह श्राद्ध है जो किसी शुभ अवसर या वृद्धि के समय किया जाता है। नान्दीमुख का अर्थ है आनन्द-मुख। जब घर में कोई शुभ कार्य जैसे विवाह, पुत्र-जन्म, गृह-प्रवेश, यज्ञ आदि हो, तो उसके पूर्व पितरों को नान्दीमुख श्राद्ध करके प्रसन्न किया जाता है। यह श्राद्ध साधारण श्राद्ध से कुछ भिन्न होता है, क्योंकि यह वृद्धि और आनन्द के अवसर पर किया जाता है।
चौथा भेद सपिण्डीकरण श्राद्ध है। यह वह श्राद्ध है जो किसी की मृत्यु के बाद बारहवें या तेरहवें दिन किया जाता है। इसमें मृत व्यक्ति की आत्मा को पितरों के साथ मिलाया जाता है। सपिण्ड का अर्थ है समान पिण्ड वाले बनाना, यानी मृत व्यक्ति को अपने पूर्व पितरों के समान बनाना। यह क्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके बाद ही मृत व्यक्ति प्रेत-योनि से मुक्त होकर पितृ-योनि में प्रवेश करता है।
इन चारों भेदों का अलग-अलग महत्व है। पार्वण श्राद्ध सामूहिक है, जिसमें तीन पीढ़ियों का आवाहन होता है। एकोद्दिष्ट व्यक्तिगत है, जिसमें एक पितर का श्राद्ध होता है। नान्दीमुख शुभ अवसर पर है, जिसमें वृद्धि की कामना की जाती है। सपिण्डीकरण मृत्यु के बाद का है, जिसमें मृत व्यक्ति को पितरों में मिलाया जाता है।
द्वितीया तिथि पर मुख्यतः दो भेद होते हैं। द्वितीया तिथि पर मुख्यतः दो प्रकार के श्राद्ध सम्पादित हो सकते हैं, जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि श्राद्ध किस अवसर पर किया जा रहा है। पहला है एकोद्दिष्ट श्राद्ध। यदि किसी परिजन की मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई हो, तो उसकी मृत्यु के ठीक एक वर्ष पश्चात् और उसके बाद प्रतिवर्ष उसी द्वितीया तिथि को जो श्राद्ध किया जाता है, वह एकोद्दिष्ट श्राद्ध कहलाता है। दूसरा है पार्वण श्राद्ध। पितृ पक्ष की द्वितीया को जो श्राद्ध किया जाता है, वह पार्वण श्राद्ध होता है।
श्राद्ध-तत्त्व और धर्मसिन्धु का स्पष्ट निर्देश है। श्राद्ध-तत्त्व और धर्मसिन्धु के अनुसार महालय के 16 दिनों यानी पूर्णिमा से अमावस्या तक में किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण विधि से ही होना चाहिए, भले ही मृत्यु की तिथि कोई भी रही हो। इसलिए पितृ पक्ष में सब श्राद्ध पार्वण ही होते हैं।
प्रत्येक भेद की विधि भी अलग होती है। पार्वण में तीन पिण्ड बनते हैं और तीन पीढ़ियों को अर्पित होते हैं। एकोद्दिष्ट में एक पिण्ड बनता है और एक पितर को अर्पित होता है। नान्दीमुख में पिण्ड का स्वरूप अलग होता है, और शुभ संकल्प से किया जाता है। सपिण्डीकरण में चार पिण्ड बनते हैं - एक मृत व्यक्ति का और तीन पूर्व पितरों के, और फिर मृत के पिण्ड को तीनों में मिलाया जाता है।
इन चारों भेदों का सम्मिलित संदेश यह है कि सनातन धर्म में श्राद्ध हर परिस्थिति के लिए विधि-विधान देता है। चाहे प्रतिवर्ष का वार्षिक श्राद्ध हो, चाहे महालय का पार्वण हो, चाहे शुभ अवसर का नान्दीमुख हो, या मृत्यु के बाद का सपिण्डीकरण हो - सबका शास्त्र-सम्मत स्वरूप है। शास्त्रीय आधार के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, याज्ञवल्क्य स्मृति, धर्मसिन्धु, श्राद्ध-तत्त्व और गरुड़ पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः श्राद्ध के मुख्य चार भेद हैं - पार्वण, एकोद्दिष्ट, नान्दीमुख यानी वृद्धिश्राद्ध और सपिण्डीकरण। द्वितीया तिथि पर पार्वण और एकोद्दिष्ट दोनों भेद हो सकते हैं।
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