विस्तृत उत्तर
वृद्धिश्राद्ध वह श्राद्ध है जो किसी वृद्धि या शुभ अवसर के समय पितरों को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है, और इसे ही नान्दीमुख श्राद्ध भी कहते हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार शास्त्रों में श्राद्ध के मुख्य रूप से चार भेद माने गए हैं - पार्वण, एकोद्दिष्ट, नान्दीमुख यानी वृद्धिश्राद्ध और सपिण्डीकरण।
वृद्धिश्राद्ध का शाब्दिक अर्थ देखें तो वृद्धि का अर्थ है बढ़ना, बढ़ोत्तरी, या समृद्धि। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से किया गया अनुष्ठान। वृद्धिश्राद्ध यानी वह श्राद्ध जो वृद्धि या समृद्धि के अवसर पर किया जाए। यह नाम ही इस श्राद्ध की मूल विशेषता को दर्शाता है।
वृद्धिश्राद्ध और नान्दीमुख श्राद्ध एक ही हैं। शास्त्रों में दोनों शब्द एक ही श्राद्ध के लिए प्रयोग होते हैं। नान्दीमुख में नान्दी का अर्थ है आनन्द, और वृद्धिश्राद्ध में वृद्धि का अर्थ है समृद्धि। दोनों ही शब्द एक ही श्राद्ध को विभिन्न दृष्टिकोण से व्यक्त करते हैं।
वृद्धिश्राद्ध की पाँच मुख्य विशेषताएँ हैं। पहली विशेषता है शुभ अवसर पर होना। यह श्राद्ध तब किया जाता है जब घर में कोई वृद्धि या शुभ कार्य का अवसर हो। दूसरी विशेषता है पितरों की प्रसन्नता प्राप्त करना। शुभ कार्य से पहले पितरों को प्रसन्न करने का उद्देश्य यह है कि उनके आशीर्वाद से कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हो।
तीसरी विशेषता है हर्ष का भाव। साधारण श्राद्ध में शोक का भाव होता है, परंतु वृद्धिश्राद्ध में हर्ष और आनन्द का भाव प्रबल होता है। चौथी विशेषता है देवताओं का भी आवाहन। साधारण श्राद्ध में मुख्यतः पितरों का आवाहन होता है, परंतु वृद्धिश्राद्ध में देवता और पितर दोनों आमंत्रित होते हैं। पाँचवीं विशेषता है शुभ संकल्प। इसमें कर्ता शुभ कार्य की सिद्धि के लिए संकल्प करता है।
वृद्धिश्राद्ध के प्रमुख अवसर इस प्रकार हैं। पहला अवसर है विवाह। पुत्र या पुत्री के विवाह से पहले वृद्धिश्राद्ध किया जाता है। दूसरा अवसर है उपनयन यानी जनेऊ संस्कार। बालक के जनेऊ से पहले पितरों को प्रसन्न किया जाता है। तीसरा अवसर है पुत्र-जन्म, नामकरण, या मुण्डन। नवजात की दीर्घ आयु और कल्याण के लिए वृद्धिश्राद्ध होता है। चौथा अवसर है गृह-प्रवेश। नए घर में प्रवेश से पहले पितरों का आशीर्वाद लिया जाता है। पाँचवाँ अवसर है यज्ञ या किसी विशेष अनुष्ठान। यज्ञ से पहले वृद्धिश्राद्ध से पितर प्रसन्न होते हैं।
वृद्धिश्राद्ध की विधि भी विशेष है। इसमें कुछ विशेष पदार्थ और मन्त्रों का प्रयोग होता है, जो साधारण श्राद्ध से अलग हैं। पिण्ड का स्वरूप और सामग्री भी कुछ भिन्न होती है। पञ्चबलि और ब्राह्मण भोजन तो होते ही हैं, परंतु संकल्प शुभ कार्य की सिद्धि के लिए होता है।
वृद्धिश्राद्ध की दिशा और जनेऊ की स्थिति भी अलग हो सकती है। साधारण श्राद्ध में कर्ता का मुख दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य की ओर होता है, और जनेऊ अपसव्य अवस्था में दाएँ कंधे पर। वृद्धिश्राद्ध में कुछ परम्पराओं के अनुसार जनेऊ बाएँ कंधे पर ही रहता है यानी सव्य अवस्था में, क्योंकि यह शुभ कार्य का प्रतीक है।
वृद्धिश्राद्ध का गहरा अर्थ यह है कि सनातन धर्म में हर शुभ कार्य पितरों के आशीर्वाद से शुरू होता है। बिना पितरों के आशीर्वाद के कोई भी कार्य पूर्ण नहीं माना जाता। इसलिए विवाह, जनेऊ, गृह-प्रवेश आदि सब शुभ अवसरों से पहले पितरों को प्रसन्न करने का विधान है।
वृद्धिश्राद्ध का व्यावहारिक प्रभाव यह है कि कार्य निर्विघ्न होता है। जब पितर प्रसन्न होते हैं, तो वंशज के सब शुभ कार्य सफल होते हैं। बाधाएँ दूर होती हैं, और कार्य में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है।
वृद्धिश्राद्ध का सामान्य फल भी विशेष है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 के अनुसार आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पितः। श्राद्ध से तृप्त पितर वंशज को दीर्घ आयु, सन्तान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य का आशीर्वाद देते हैं। ये फल वृद्धिश्राद्ध पर भी मिलते हैं।
वृद्धिश्राद्ध और साधारण श्राद्ध का अंतर अत्यंत स्पष्ट है। साधारण श्राद्ध जैसे पार्वण या एकोद्दिष्ट शोक और स्मरण के भाव से होते हैं। उनमें कर्ता मृत पितर को याद करता है और श्रद्धांजलि देता है। वृद्धिश्राद्ध शुभ और हर्ष के भाव से होता है। उनमें कर्ता शुभ कार्य की कामना करता है, और पितरों से आशीर्वाद माँगता है।
द्वितीया तिथि और वृद्धिश्राद्ध का सम्बन्ध भी विशेष है। यदि किसी का विवाह या कोई शुभ कार्य द्वितीया तिथि पर निर्धारित है, तो उसके पहले द्वितीया पर वृद्धिश्राद्ध करना श्रेष्ठ होता है। द्वितीया का काम्य फल कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद की प्राप्ति है, इसलिए विवाह से पहले द्वितीया पर वृद्धिश्राद्ध विशेष रूप से उपयोगी है। शास्त्रीय आधार के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, धर्मसिन्धु, श्राद्ध-तत्त्व और गरुड़ पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः वृद्धिश्राद्ध वह श्राद्ध है जो किसी वृद्धि या शुभ अवसर पर पितरों को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। इसे ही नान्दीमुख श्राद्ध भी कहते हैं। यह विवाह, जनेऊ, पुत्र-जन्म, गृह-प्रवेश, और यज्ञ से पहले किया जाता है, और इसमें हर्ष का भाव प्रबल होता है।
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