विस्तृत उत्तर
पार्वण श्राद्ध की मुख्य विशेषता तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन और विश्वेदेवों की स्थापना है। शास्त्रीय आधार के अनुसार पितृ पक्ष यानी महालय की द्वितीया को जो श्राद्ध किया जाता है, वह पार्वण श्राद्ध होता है। पार्वण श्राद्ध में एक साथ तीन पीढ़ियों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता पक्ष यानी मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह का सतीक यानी पत्नी सहित आवाहन किया जाता है। महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों यानी पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है।
पार्वण शब्द का अर्थ देखें तो पर्व का अर्थ है विशेष अवसर या मांगलिक काल। पार्वण यानी पर्व से सम्बन्धित। यह श्राद्ध विशेष पर्व या काल पर किया जाता है, इसलिए पार्वण कहलाता है। पितृ पक्ष यानी महालय एक विशेष पर्व है, और इस काल में होने वाला श्राद्ध मुख्यतः पार्वण होता है।
पार्वण श्राद्ध की पाँच प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं। पहली विशेषता है तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन। पार्वण श्राद्ध में एक साथ तीन पीढ़ियों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता पक्ष यानी मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह का सतीक यानी पत्नी सहित आवाहन किया जाता है। यह पार्वण की सबसे बड़ी विशेषता है।
दूसरी विशेषता है विश्वेदेवों की अनिवार्य स्थापना। महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों यानी पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है। विश्वेदेव श्राद्ध में पितरों के साथ आहूत होते हैं, और हवि उन्हीं के माध्यम से पितरों तक पहुँचता है।
तीसरी विशेषता है तीन पिण्डों का दान। पार्वण में तीन पिण्ड बनाए जाते हैं, जो पिता, पितामह और प्रपितामह के प्रतीक होते हैं। यह संख्या भगवान वराह की दिव्य लीला से जुड़ी है, जिन्होंने पहले तीन पिण्डों का निर्माण कर इन्हें तीन पीढ़ियों के शाश्वत प्रतीक घोषित किया था।
चौथी विशेषता है पर्व-काल में होना। पार्वण श्राद्ध मुख्यतः पितृ पक्ष यानी महालय के 16 दिनों में किया जाता है। यह कोई व्यक्तिगत मृत्यु तिथि का श्राद्ध नहीं है, बल्कि सब पितरों के लिए सामूहिक श्राद्ध है। पाँचवीं विशेषता है अनिवार्य प्रकृति। श्राद्ध-तत्त्व और धर्मसिन्धु के अनुसार महालय के 16 दिनों यानी पूर्णिमा से अमावस्या तक में किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण विधि से ही होना चाहिए, भले ही मृत्यु की तिथि कोई भी रही हो।
पार्वण और एकोद्दिष्ट का अंतर अत्यंत स्पष्ट है। एकोद्दिष्ट में केवल एक पितर का आवाहन होता है, और एक पिण्ड बनता है। पार्वण में तीन पीढ़ियों का सामूहिक आवाहन होता है, और तीन पिण्ड बनते हैं। एकोद्दिष्ट हर मास की मृत्यु तिथि पर होता है। पार्वण मुख्यतः पितृ पक्ष में होता है। एकोद्दिष्ट में विश्वेदेवों की स्थापना अनिवार्य नहीं है, परंतु पार्वण में अनिवार्य है।
पार्वण श्राद्ध में पितरों का आगमन भी विशेष है। जो जीवात्माएँ पितृलोक को प्राप्त हो चुकी हैं, वे महालय के समय अपने वंशजों के निकट सूक्ष्म रूप में आती हैं और अपने निमित्त किए जाने वाले पार्वण श्राद्ध की प्रतीक्षा करती हैं। पितर इस समय वायु रूप में आते हैं, और हवि स्वीकार करते हैं।
पार्वण श्राद्ध के अधिष्ठाता देवता भी विशेष हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.268 के अनुसार श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य हैं। पार्वण में जब वंशज तीन पीढ़ियों के निमित्त श्राद्ध करता है, तो ये तीनों देवता क्रमशः उन तीन पीढ़ियों के प्रतिनिधि के रूप में हव्य-कव्य को ग्रहण करते हैं। वसु पिता पीढ़ी का, रुद्र पितामह पीढ़ी का, और आदित्य प्रपितामह पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
पार्वण श्राद्ध की विधि भी विशेष विस्तृत है। इसमें कुतप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त, या अपराह्न काल का चयन होता है। कर्ता दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य दिशा की ओर मुख करके बैठता है, और जनेऊ अपसव्य अवस्था में दाएँ कंधे पर होता है। पञ्चबलि निकाली जाती है, अग्नौकरण किया जाता है, तीन पिण्ड बनाकर अर्पित किए जाते हैं, और सुपात्र ब्राह्मणों को सात्विक हविष्यान्न का भोजन कराया जाता है।
पार्वण श्राद्ध का फल भी अद्वितीय है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 के अनुसार आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पितः। श्राद्ध से तृप्त पितर वंशज को आयु, सन्तान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य का आशीर्वाद देते हैं।
द्वितीया पार्वण का काम्य फल भी विशेष है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार जो व्यक्ति द्वितीया तिथि को काम्य भावना से पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसे कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद और पशू वै यानी पशु-धन की प्राप्ति होती है।
स्कन्द पुराण का पारलौकिक फल भी विशेष है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार जो मनुष्य महालय यानी पितृ पक्ष की द्वितीया तिथि को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ अपने पितरों का पार्वण श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर अत्यंत प्रसन्न होते हैं, और वह कैलास धाम को प्राप्त करता है।
पार्वण श्राद्ध न करने का दण्ड भी विशेष है। स्कन्द पुराण के अनुसार जो मनुष्य द्वितीया तिथि को अधिकार होने पर भी महालय का पार्वण श्राद्ध नहीं करता, भगवान शम्भु उस पर कुपित हो जाते हैं, और उसे रौरव और कालसूत्र नामक भयंकर नरकों की यातना भोगनी पड़ती है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति, स्कन्द पुराण, श्राद्ध-तत्त्व, धर्मसिन्धु और गरुड़ पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः पार्वण श्राद्ध की मुख्य विशेषता तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन यानी पिता, पितामह, प्रपितामह और मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह का पत्नी सहित आवाहन है। इसके साथ विश्वेदेवों की अनिवार्य स्थापना और तीन पिण्डों का दान इसकी अनूठी विशेषताएँ हैं।
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