विस्तृत उत्तर
एकोद्दिष्ट श्राद्ध में केवल एक पिण्ड बनता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार एकोद्दिष्ट श्राद्ध में केवल उसी एक मृत व्यक्ति यानी उद्देश्य के लिए एक पिण्ड का दान किया जाता है।
एक पिण्ड का सिद्धांत समझें तो एकोद्दिष्ट का अर्थ ही है एक उद्देश्य वाला, यानी एक पितर के लिए। क्योंकि श्राद्ध केवल एक पितर के लिए होता है, इसलिए पिण्ड भी केवल एक ही बनाया जाता है। यह नियम शास्त्रों में अकाट्य रूप से निर्धारित है।
एक पिण्ड किसके लिए बनता है, इसका भी स्पष्ट निर्देश है। यह पिण्ड उसी मृत व्यक्ति के लिए होता है, जिसकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध किया जा रहा है। यदि मृत्यु द्वितीया को हुई थी, तो उसी पितर के लिए एक पिण्ड बनेगा। तीन पीढ़ियों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह के लिए नहीं।
एकोद्दिष्ट और पार्वण के पिण्ड का अंतर अत्यंत स्पष्ट है। पार्वण श्राद्ध में तीन पिण्ड बनते हैं। पार्वण में एक साथ तीन पीढ़ियों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता पक्ष यानी मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह का सतीक यानी पत्नी सहित आवाहन किया जाता है, और तीन पिण्ड बनाए जाते हैं। एकोद्दिष्ट में केवल एक पिण्ड बनता है।
पिण्ड बनाने की सामग्री विशेष है। पिण्ड के लिए सत्तू, काले तिल, घृत यानी घी और मधु यानी शहद को मिलाकर तैयार किया जाता है। ये सब सामग्रियाँ पवित्र हैं। काले तिल भगवान विष्णु के स्वेद यानी पसीने से उत्पन्न माने गए हैं, और कुशा भगवान विष्णु के रोम से। ये दोनों पितृ-कर्म में अनिवार्य हैं।
पिण्ड का आकार और स्थापना भी विशेष है। पिण्ड गोलाकार बनाया जाता है, और कुशा के ऊपर रखा जाता है। कर्ता का मुख दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य दिशा की ओर होना चाहिए, और जनेऊ अपसव्य अवस्था में दाएँ कंधे पर। पिण्ड को कुशाओं पर रखकर उस पितर के गोत्र और नाम का उच्चारण करते हुए अर्पित किया जाता है।
भगवान वराह की कथा से पिण्ड का सम्बन्ध भी जुड़ा है। महाभारत के शांतिपर्व और अन्य वैदिक संहिताओं के अनुसार पिण्डदान की पवित्र परम्परा स्वयं भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा प्रारंभ की गई थी। उन्होंने तीन गोल पिण्डों का निर्माण किया और उन्हें कुशा के ऊपर दक्षिण दिशा की ओर स्थापित किया, और घोषित किया कि ये तीन पिण्ड क्रमशः पिता, पितामह और प्रपितामह के शाश्वत प्रतीक माने जाएं।
यद्यपि भगवान वराह ने तीन पिण्ड बनाए थे, परंतु एकोद्दिष्ट में केवल एक पिण्ड बनाने का विधान शास्त्रों में अलग से निर्धारित है। यह क्योंकि एकोद्दिष्ट में केवल एक पितर का आवाहन होता है, तीन पीढ़ियों का नहीं।
एक पिण्ड का प्रतीकात्मक अर्थ अत्यंत गहरा है। यह पिण्ड उसी एक पितर का प्रतिनिधित्व करता है, जिसकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध हो रहा है। पिण्ड में सत्तू, काले तिल, घृत और मधु - ये सब पवित्र पदार्थ मिलकर पितर को सूक्ष्म तृप्ति देते हैं। पिण्ड के माध्यम से पितर का स्वरूप वंशज के सामने प्रकट होता है, और वंशज की श्रद्धा का प्रत्यक्ष प्रदर्शन होता है।
पिण्डदान का मन्त्र-संस्कार भी विशेष है। पिण्ड अर्पित करते समय कर्ता उस पितर के गोत्र और नाम का स्पष्ट उच्चारण करता है। गोत्र और नाम के साथ ही पितर सूक्ष्म रूप में पहुँचते हैं और हवि स्वीकार करते हैं। यह वेदमन्त्रों की दिव्य शक्ति का परिणाम है।
गरुड़ पुराण के अनुसार पिण्ड का रूपान्तरण भी होता है। गरुड़ पुराण के प्रेत खण्ड अध्याय 10 के अनुसार जब वंशज देश, काल और पात्र का विचार करके उचित मन्त्रों के साथ श्राद्ध करता है, तो वे वेद मन्त्र और गोत्र-नाम उस अन्न को एक सूक्ष्म ऊर्जा में परिवर्तित कर देते हैं। यदि वह मृत जीवात्मा देवता बन गई है, तो श्राद्ध का अन्न उसे अमृत के रूप में प्राप्त होता है। यदि गन्धर्व बन गया है तो भोग के रूप में, पशु योनि में तृण के रूप में, सर्प योनि में वायु के रूप में, पक्षी है तो फल के रूप में, और मनुष्य बन गया है तो अन्न और धन के रूप में। यह रूपान्तरण एकोद्दिष्ट के एक पिण्ड पर भी समान रूप से लागू होता है।
एक पिण्ड के बावजूद श्राद्ध का फल पूर्ण मिलता है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 के अनुसार श्राद्ध से तृप्त पितर वंशज को आयु, प्रजा, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य का आशीर्वाद देते हैं। एकोद्दिष्ट में भी ये सब फल मिलते हैं, क्योंकि वहाँ भी श्रद्धा से किया गया श्राद्ध पितर को तृप्त करता है।
द्वितीया एकोद्दिष्ट का विशेष फल भी अद्वितीय है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार जो व्यक्ति द्वितीया तिथि को काम्य भावना से पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसे कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद और पशू वै यानी पशु-धन की प्राप्ति होती है। यह फल एकोद्दिष्ट के एक पिण्ड दान पर भी मिलता है। शास्त्रीय आधार के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, धर्मसिन्धु, श्राद्ध-तत्त्व, याज्ञवल्क्य स्मृति, गरुड़ पुराण और महाभारत शांतिपर्व इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः एकोद्दिष्ट श्राद्ध में केवल एक पिण्ड बनता है। यह पिण्ड उसी एक मृत व्यक्ति के लिए होता है जिसकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध किया जा रहा है। पार्वण की तरह तीन पीढ़ियों के तीन पिण्ड नहीं बनते।
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