ब्राह्मण भोजन पुरश्चरण का पाँचवाँ अंग है — अनुष्ठान के अंत में 13 सात्विक विद्वान ब्राह्मणों को भोजन कराना। यह समाज और ब्रह्मांडीय शक्तियों के प्रति कृतज्ञता और ऋण चुकाने का कृत्य है।
मार्जन में तर्पण का 10% = 125 बार कुशा से स्वयं पर या रोगी के चित्र पर जल छिड़कते हैं ('मार्जयामि' या 'अभिषिंचयामि') — यह शारीरिक और मानसिक दोषों को प्रक्षालित करता है।
तर्पण में हवन का 10% = 1,250 बार जल में दूध-तिल मिलाकर 'तर्पयामि' कहकर इष्ट देव और पितरों को अर्पित करते हैं — यह हवन की ऊष्मा को शांत करता है।
हवन में कुल जप का 10% = 12,500 आहुतियाँ दी जाती हैं — अग्नि में समिधा और औषधियों की आहुति से मंत्र का प्रभाव वायुमंडल में स्थापित होता है।
पुरश्चरण के 5 अंग: (1) मंत्र जप — 1,25,000; (2) हवन — 12,500 आहुतियाँ; (3) तर्पण — 1,250 बार; (4) मार्जन — 125 बार; (5) ब्राह्मण भोजन — 13 ब्राह्मण। प्रत्येक अगला पिछले का 10%।
पुरश्चरण वैदिक गणित का व्यवस्थित ढांचा है जो मंत्र जप से उत्पन्न ऊर्जा को भौतिक धरातल पर संतुलित (Grounding) करता है — इसके पाँच अंग हैं, प्रत्येक अगला पिछले का 10% होता है।
मंत्रमहार्णव: पुरश्चरण-सिद्ध साधक का मंत्र और साधक — दोनों एक साथ सिद्ध। सात आयाम: मंत्र-देवता जीवंत संबंध, अहंकार-विसर्जन, चित्त-स्थिरता, कर्म-क्षय, तीनों ऋण-मुक्ति, शक्तिपात की पात्रता, मोक्ष-मार्ग त्वरण। पुरश्चरण = शरीर-मन की तीर्थयात्रा।
पुरश्चरण में अभिषेक (मार्जन): संख्या = तर्पण का 10वाँ। पाँच कारण: देवता का सम्मान-स्नान, साधक-स्थल-मूर्ति शुद्धि, तर्पण-दोष-निवारण, देवता का सान्निध्य, पुरश्चरण की पूर्णता। 'मार्जनं शुद्धिकारकम्' (कुलार्णव)। अभिषेक सामग्री: शिव (दूध-गंगाजल), देवी (मधु-दही), गणपति (पंचामृत)।
मनुस्मृति: तीन ऋण — देव (हवन), ऋषि (तर्पण-स्वाध्याय), पितृ (तर्पण-श्राद्ध)। पुरश्चरण में तर्पण: देवता-तृप्ति, ऋषि-ऋण मुक्ति, पितृ-तृप्ति (पितृ-विघ्न दूर), हवन-दोष निवारण। तर्पण विधि: देव (तीर्थ), ऋषि (किनारे), पितृ (अंगूठे से)। संख्या = हवन का 10वाँ।
पुरश्चरण में हवन के पाँच कारण: जप-दोष शुद्धि (सर्वप्रमुख — अग्नि सर्वशुद्धिकर), देवता-तृप्ति, पाँच तत्वों का संतुलन, मंत्र-ऊर्जा का ब्रह्मांड में प्रसार, देव-ऋण मुक्ति। गीता (4.24): हवन = ब्रह्मार्पण। संख्या = जप का 10वाँ। कुंड में 'मंत्र + स्वाहा' के साथ आहुति।
मंत्रमहार्णव: पुरश्चरण = अक्षर-संख्या × 1 लाख। उदाहरण: गायत्री (24 अक्षर) = 24 लाख, नमः शिवाय = 5 लाख, महामृत्युंजय = 33 लाख। नित्य 2 घंटा जप ≈ 1 वर्ष में 8 लाख पूर्ण। कुलार्णव: निर्धारित से कम न जपें। कुल: जप + हवन (N/10) + तर्पण (N/100) + मार्जन (N/1000)। संख्या से अधिक भाव-शुद्धि।
कुलार्णव: पुरश्चरण में केवल गुरु-दत्त मंत्र — स्वेच्छा से लिया मंत्र निष्फल। तीन शर्तें: गुरु-दीक्षित, इष्टदेव का, शास्त्र-सम्मत। प्रमुख मंत्र: गायत्री (24 लाख — सर्वोत्तम), नमः शिवाय (5 लाख), ॐ नमो नारायणाय (8 लाख), नवार्ण (9 लाख), महामृत्युंजय (33 लाख)। एक पुरश्चरण में एक ही मंत्र।
गीता (10.25): 'सभी यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ।' पुरश्चरण में जप = प्राण (शेष चारों अंग जप-संख्या पर निर्भर)। जप = नाद-संचय (लाखों ऊर्जा-इकाइयाँ)। भाव-सहित जप > यंत्रवत् जप। एक दिन छूटे = पुरश्चरण खंडित = पुनः आरंभ। पुरश्चरण में मानस जप सर्वोत्तम।
पुरश्चरण के पाँच अंग (मंत्रमहार्णव): जप (मूल — अक्षर × लाख), हवन (जप का 10वाँ — अग्नि में आहुति), तर्पण (हवन का 10वाँ — देव-ऋषि-पितर को जल), मार्जन (तर्पण का 10वाँ — जल-छिड़काव), ब्राह्मण अर्चन (मार्जन का 10वाँ — भोजन-दक्षिणा)। अनुपात: 10 लाख → 1 लाख → 10000 → 1000 → 100।
पुरश्चरण के छह चरण: संकल्प → नित्य जप (ब्रह्ममुहूर्त, एक संख्या) → हवन (जप का 10वाँ) → तर्पण (हवन का 10वाँ) → मार्जन → ब्राह्मण भोजन। कठोर नियम: एकाहार, भूमि-शयन, ब्रह्मचर्य, मंत्र-गोपनीयता, एक दिन न छूटे। खंड-पुरश्चरण (40-90 दिन) गुरु-मार्गदर्शन में स्वीकार्य।
मंत्रमहार्णव: पुरश्चरण = मंत्र का परम जीवन। परिभाषा: शास्त्र-निर्धारित संख्या में नियमबद्ध जप + पाँच सहायक क्रियाएं (हवन-तर्पण-मार्जन-ब्राह्मण भोजन)। कुलार्णव: बिना पुरश्चरण जप = करोड़ों कल्पों में भी फल नहीं। यह मंत्र को 'सिद्ध' करने की पूर्ण प्रक्रिया है।