विस्तृत उत्तर
पुरश्चरण के पाँच प्रमुख अंग होते हैं, जिनमें प्रत्येक अगला चरण पिछले चरण का दशांश (१०%) होता है:
१. मंत्र जप: रुद्राक्ष की माला से संकल्पित सवा लाख (१,२५,०००) बार मंत्र का उच्चारण। इसे सामान्यतः ५ से ७ पंडितों द्वारा सामूहिक रूप से कुछ दिनों में, या किसी एक साधक द्वारा १२५ दिनों में (प्रतिदिन १० माला अर्थात् १००० जप) पूर्ण किया जाता है।
२. हवन (होम): जप की कुल संख्या का १०% अंश — १२,५०० आहुतियां। अग्नि में समिधा और विशिष्ट औषधियों की आहुति देना। यह मंत्र के प्रभाव को वायुमंडल में स्थापित करता है।
३. तर्पण: हवन की कुल संख्या का १०% अंश — १,२५० बार। जल में दूध, तिल आदि मिलाकर 'तर्पयामि' कहकर इष्ट देव और पितरों को अर्पित करना। यह हवन की ऊष्मा को शांत करता है।
४. मार्जन: तर्पण की कुल संख्या का १०% अंश — १२५ बार। 'मार्जयामि' या 'अभिषिंचयामि' कहकर कुशा के माध्यम से स्वयं पर या रोगी के चित्र पर जल छिड़कना। यह शारीरिक एवं मानसिक दोषों को प्रक्षालित करता है।
५. ब्राह्मण भोजन: मार्जन की कुल संख्या का १०% अंश — १३ ब्राह्मण। अनुष्ठान के अंत में सात्विक और विद्वान ब्राह्मणों को भोजन कराना। यह समाज और ब्रह्मांडीय शक्तियों के प्रति कृतज्ञता और ऋण चुकाने का कृत्य है।



