विस्तृत उत्तर
पुरश्चरण में अभिषेक (मार्जन) की अनिवार्यता और महत्व:
मंत्रमहार्णव — अभिषेक की परिभाषा
मार्जनं देवतायाश्च अभिषेकः स उच्यते।
तर्पणस्य दशांशेन पुरश्चरणे विधीयते।।'
— देवता का मार्जन (जल-अभिषेक) ही 'मार्जन-अंग' है। यह तर्पण के दशांश में पुरश्चरण में विहित है।
अभिषेक क्यों अनिवार्य — पाँच कारण
1देवता का सम्मान और स्नान
शिव पुराण (रुद्राभिषेक माहात्म्य): देवता की मूर्ति को जल से अभिषेक करना = देवता को स्नान कराना। जैसे अतिथि के आने पर पाद-प्रक्षालन करते हैं — देवता को अभिषेक से सत्कार।
2साधक की बाह्य-आंतरिक शुद्धि
कुलार्णव (15.77): 'मार्जनं शुद्धिकारकम्।' — मार्जन (जल-छिड़काव) साधक, साधना-स्थल, और देवता — तीनों की शुद्धि करता है। जप और हवन में जो सूक्ष्म अशुद्धियाँ रह जाएं — मार्जन उन्हें धोता है।
3तर्पण-दोष-निवारण
मंत्रमहार्णव: तर्पण के दौरान यदि कोई त्रुटि हो — अभिषेक उसे शुद्ध करता है। यह 'शुद्धि का शुद्धिकर्ता' है।
4जल-तत्व के माध्यम से देवता का सान्निध्य
अग्निपुराण: जल सर्वशुद्धिकर है — जहाँ भी जल है, वहाँ देवशक्ति का वास। अभिषेक से देवता की मूर्ति में चेतना और अधिक जाग्रत होती है।
5पुरश्चरण का 'पूर्णता-अंग'
स्कंद पुराण: बिना अभिषेक के पुरश्चरण 'अपूर्ण' माना जाता है। अभिषेक = पुरश्चरण की स्वीकृति का प्रतीक।
अभिषेक और मार्जन में अंतर
- ▸मार्जन = कुश-शाखा से जल छिड़काव — स्वयं पर, स्थान पर, और मूर्ति पर
- ▸अभिषेक = देवता-मूर्ति पर पंचामृत या जल-धारा — विशेष पूजन-विधि
पुरश्चरण के संदर्भ में मंत्रमहार्णव इन्हें समानार्थी रूप से प्रयुक्त करता है।
अभिषेक सामग्री (देवता-अनुसार)
- ▸शिव: दूध, जल, पंचामृत, गंगाजल
- ▸विष्णु: पंचामृत, गंधोदक
- ▸देवी: दूध, मधु, दही, गंधोदक
- ▸गणपति: दूध, पंचामृत




