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श्रीसूक्त पाठ: दरिद्रता (अलक्ष्मी) का नाश और अपार धन प्राप्ति !
लक्ष्मी

श्रीसूक्त पाठ: दरिद्रता (अलक्ष्मी) का नाश और अपार धन प्राप्ति !

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श्रीसूक्त: लक्ष्मी पूजन में वैभव, कृपा और समृद्धि का वैदिक आह्वान

श्रीसूक्त: लक्ष्मी पूजन में वैभव, कृपा और समृद्धि का वैदिक आह्वान

सनातन धर्म की ज्ञान-गंगा का उद्गम स्रोत हैं हमारे वेद। इन्हीं वेदों में, ऋग्वेद के हृदय से प्रकट हुई एक ऐसी दिव्य स्तुति है जो सहस्राब्दियों से भक्तों के जीवन को धन, धान्य और सौभाग्य से सींच रही है—वही है 'श्रीसूक्त'। यह केवल धन प्राप्ति का मंत्र नहीं, अपितु स्वयं धन की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी का साक्षात् शब्द-स्वरूप है। लक्ष्मी पूजन के पुण्य अवसर पर श्रीसूक्त का संपूर्ण पाठ करने से जो अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं, उनका वर्णन शास्त्रों में विस्तार से किया गया है। आइए, हम उन शास्त्र-सम्मत लाभों को समझें।

अलक्ष्मी का नाश: समृद्धि का प्रथम सोपान

शास्त्रों के अनुसार, लक्ष्मी की एक ज्येष्ठ भगिनी (बड़ी बहन) हैं, जिनका नाम 'अलक्ष्मी' या 'ज्येष्ठा' है। वे क्षुधा, पिपासा, दरिद्रता, कलह, रोग और दुर्भाग्य की प्रतीक हैं । जहाँ अलक्ष्मी का वास होता है, वहाँ लक्ष्मी कभी नहीं ठहरतीं। श्रीसूक्त की सबसे बड़ी महिमा यह है कि यह केवल लक्ष्मी का आवाहन ही नहीं करता, अपितु अलक्ष्मी का समूल नाश भी करता है।

श्रीसूक्त के मंत्रों में भक्त प्रार्थना करता है:

क्षुत्पिपासामलांज्येष्ठामलक्ष्मींनाशयाम्यहम्।अभूतिमसमृद्धिंचसर्वांनिर्णुदमेगृहात्॥

अर्थात, "मैं भूख और प्यास रूपी मल धारण करने वाली ज्येष्ठा अलक्ष्मी का नाश करता हूँ। हे देवी! मेरे घर से सभी प्रकार के अमंगल और दरिद्रता को बाहर निकाल दें।" इस प्रकार, श्रीसूक्त का पाठ एक आध्यात्मिक कवच का निर्माण करता है, जो साधक के जीवन से दुर्भाग्य और दरिद्रता के अंधकार को मिटाकर समृद्धि के सूर्य का उदय करता है।

भौतिक एवं आध्यात्मिक फलों की वर्षा

श्रीसूक्त का पाठ करने वाले साधक पर माता लक्ष्मी की कृपा से भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार के फलों की वर्षा होती है।

1. स्थिर एवं अक्षय ऐश्वर्य की प्राप्ति:

श्रीसूक्त में अग्निदेव से प्रार्थना की गई है कि वे ऐसी लक्ष्मी का आवाहन करें जो 'अनपगामिनी' हों—अर्थात् जो आकर फिर कभी वापस न जाएँ । इसके पाठ से साधक को स्वर्ण, रजत, गौ, अश्व, भूमि, उत्तम संतान और धान्य की प्रचुर मात्रा में प्राप्ति होती है । यह केवल चंचल धन नहीं, बल्कि कुल में स्थिर रहने वाली अचल संपत्ति और वंश वृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करता है।

2. ऋण, रोग और शोक से मुक्ति:

इस सूक्त की फलश्रुति में स्पष्ट उल्लेख है कि इसके पाठ से ऋण, रोग, दरिद्रता, पाप, अपमृत्यु, भय और मानसिक संताप—ये सभी सदा के लिए नष्ट हो जाते हैं । व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु का वरदान मिलता है।

3. मानसिक एवं चारित्रिक शुद्धि:

श्रीसूक्त का सबसे गूढ़ और महत्वपूर्ण लाभ साधक के अंतःकरण की शुद्धि है। शास्त्र कहते हैं:

'नक्रोधोनचमात्सर्यंनलोभोनाशुभामतिः।भवन्तिकृतपुण्यानांभक्त्याश्रीसूक्तजापिनाम्॥'

अर्थात्, "जो पुण्यवान भक्त श्रद्धापूर्वक श्रीसूक्त का जप करते हैं, उनके मन में न क्रोध रहता है, न ईर्ष्या, न लोभ और न ही किसी प्रकार के अशुभ विचार आते हैं।" जब अंतःकरण शुद्ध हो जाता है, तब व्यक्ति स्वतः ही लक्ष्मी को धारण करने के योग्य बन जाता है। ऐसी समृद्धि स्थायी होती है और व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ाती है।

श्रीसूक्त पाठ की सरल शास्त्रीय विधि

लक्ष्मी पूजन के दिन या प्रत्येक शुक्रवार को श्रीसूक्त का पाठ विशेष फलदायी होता है। इसकी विधि अत्यंत सरल किंतु भाव-प्रधान है:

शुद्धि:

स्नान करके स्वच्छ, विशेषकर श्वेत या गुलाबी वस्त्र धारण करें और पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें ।

पूजन:

अपने पूजा स्थान पर माता लक्ष्मी का चित्र या विग्रह स्थापित करें। उनके समक्ष शुद्ध घृत (गाय का घी) का दीपक प्रज्वलित करें। माता लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश और भगवान विष्णु का पूजन अवश्य करें, क्योंकि श्रीहरि के बिना लक्ष्मी स्थिर नहीं रहतीं।

संकल्प:

हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु श्रीसूक्त पाठ का संकल्प करें।

पाठ:

अब पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ श्रीसूक्त की सोलह ऋचाओं (फलश्रुति सहित) का पाठ करें। यदि संभव हो, तो प्रत्येक ऋचा के बाद माता को एक कमल पुष्प या इत्र में डुबोई हुई रुई अर्पित करें।

आरती एवं क्षमा प्रार्थना:

पाठ पूर्ण होने पर माता लक्ष्मी की आरती करें और पूजन में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा याचना करें।

निष्कर्ष

श्रीसूक्त केवल भौतिक धन की कुंजी नहीं, अपितु यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाला एक दिव्य सेतु है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची समृद्धि केवल बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आंतरिक पवित्रता, मानसिक शांति और धर्मपरायण जीवन में निहित है। जब कोई साधक पूर्ण श्रद्धा से इसका पाठ करता है, तो वह केवल धनवान ही नहीं बनता, अपितु एक उत्तम चरित्र का मनुष्य भी बनता है, जिसके जीवन में माता महालक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है।