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पुरश्चरण📜 मंत्रमहार्णव (पुरश्चरण प्रकरण), कुलार्णव तंत्र (15.68-90), शारदातिलक तंत्र (25वाँ पटल), तंत्रसार, अग्निपुराण2 मिनट पठन

पुरश्चरण कैसे किया जाता है?

संक्षिप्त उत्तर

पुरश्चरण के छह चरण: संकल्प → नित्य जप (ब्रह्ममुहूर्त, एक संख्या) → हवन (जप का 10वाँ) → तर्पण (हवन का 10वाँ) → मार्जन → ब्राह्मण भोजन। कठोर नियम: एकाहार, भूमि-शयन, ब्रह्मचर्य, मंत्र-गोपनीयता, एक दिन न छूटे। खंड-पुरश्चरण (40-90 दिन) गुरु-मार्गदर्शन में स्वीकार्य।

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विस्तृत उत्तर

पुरश्चरण की सम्पूर्ण शास्त्रोक्त विधि — चरण-दर-चरण:

प्रथम चरण — संकल्प

पुरश्चरण आरंभ करने से पूर्व — हाथ में जल, अक्षत, और पुष्प लेकर संकल्प करें:

अमुक मंत्र का पुरश्चरण, अमुक संख्या में, अमुक काल तक, अमुक फल के लिए (या निष्काम भाव से) करूँगा।

संकल्प एक बार लेने के बाद — पुरश्चरण पूर्ण होने तक निर्बाध चलेगा।

द्वितीय चरण — नित्य-क्रम

प्रतिदिन का अनुष्ठान-क्रम:

  1. 1ब्रह्ममुहूर्त में उठें — स्नान, शुद्ध वस्त्र
  2. 2आसन पर बैठें — कुशासन या ऊनी
  3. 3देवता का ध्यान — 5 मिनट
  4. 4गुरु-स्मरण — गुरु का ध्यान करें
  5. 5निश्चित संख्या में जप — प्रतिदिन एक ही संख्या
  6. 6जप-दान — जप का 10वाँ भाग हवन को समर्पित (नित्य मानसिक)

तृतीय चरण — हवन (अंत में या नित्य)

शारदातिलक: पुरश्चरण के अंत में — या नित्य जप के साथ — हवन। कुल जप का 10वाँ भाग = हवन-संख्या।

चतुर्थ चरण — तर्पण

हवन के बाद — हवन का 10वाँ भाग — जल से देवता और पितरों को तर्पण।

पंचम चरण — मार्जन/अभिषेक

तर्पण का 10वाँ — देवता-मूर्ति पर जल-अभिषेक।

षष्ठ चरण — ब्राह्मण भोजन

मार्जन का 10वाँ = ब्राह्मण भोजन की संख्या। यदि ब्राह्मण उपलब्ध न हों — अनाथाश्रम या गरीबों को भोजन करवाएं।

पुरश्चरण के कठोर नियम (मंत्रमहार्णव)

  • एकाहार — दिन में एक बार सात्विक भोजन
  • भूमि-शयन — जमीन पर सोना
  • ब्रह्मचर्य — मन-वचन-कर्म से
  • मंत्र-गोपनीयता — किसी को न बताएं
  • नित्यता — एक दिन भी जप न छूटे
  • क्षौर-वर्जन — पुरश्चरण काल में बाल-दाढ़ी न कटवाएं (परंपरा-भेद से)

खंड-पुरश्चरण (व्यावहारिक विकल्प)

शारदातिलक: यदि एक बैठक में सम्पूर्ण पुरश्चरण संभव न हो — गुरु के मार्गदर्शन में 40 दिन, 90 दिन, या 6 माह के खंडों में विभाजित करें। प्रत्येक खंड के अंत में हवन-तर्पण अनिवार्य।

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शास्त्रीय स्रोत
मंत्रमहार्णव (पुरश्चरण प्रकरण), कुलार्णव तंत्र (15.68-90), शारदातिलक तंत्र (25वाँ पटल), तंत्रसार, अग्निपुराण
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