विस्तृत उत्तर
पुरश्चरण की सम्पूर्ण शास्त्रोक्त विधि — चरण-दर-चरण:
प्रथम चरण — संकल्प
पुरश्चरण आरंभ करने से पूर्व — हाथ में जल, अक्षत, और पुष्प लेकर संकल्प करें:
अमुक मंत्र का पुरश्चरण, अमुक संख्या में, अमुक काल तक, अमुक फल के लिए (या निष्काम भाव से) करूँगा।
संकल्प एक बार लेने के बाद — पुरश्चरण पूर्ण होने तक निर्बाध चलेगा।
द्वितीय चरण — नित्य-क्रम
प्रतिदिन का अनुष्ठान-क्रम:
- 1ब्रह्ममुहूर्त में उठें — स्नान, शुद्ध वस्त्र
- 2आसन पर बैठें — कुशासन या ऊनी
- 3देवता का ध्यान — 5 मिनट
- 4गुरु-स्मरण — गुरु का ध्यान करें
- 5निश्चित संख्या में जप — प्रतिदिन एक ही संख्या
- 6जप-दान — जप का 10वाँ भाग हवन को समर्पित (नित्य मानसिक)
तृतीय चरण — हवन (अंत में या नित्य)
शारदातिलक: पुरश्चरण के अंत में — या नित्य जप के साथ — हवन। कुल जप का 10वाँ भाग = हवन-संख्या।
चतुर्थ चरण — तर्पण
हवन के बाद — हवन का 10वाँ भाग — जल से देवता और पितरों को तर्पण।
पंचम चरण — मार्जन/अभिषेक
तर्पण का 10वाँ — देवता-मूर्ति पर जल-अभिषेक।
षष्ठ चरण — ब्राह्मण भोजन
मार्जन का 10वाँ = ब्राह्मण भोजन की संख्या। यदि ब्राह्मण उपलब्ध न हों — अनाथाश्रम या गरीबों को भोजन करवाएं।
पुरश्चरण के कठोर नियम (मंत्रमहार्णव)
- ▸एकाहार — दिन में एक बार सात्विक भोजन
- ▸भूमि-शयन — जमीन पर सोना
- ▸ब्रह्मचर्य — मन-वचन-कर्म से
- ▸मंत्र-गोपनीयता — किसी को न बताएं
- ▸नित्यता — एक दिन भी जप न छूटे
- ▸क्षौर-वर्जन — पुरश्चरण काल में बाल-दाढ़ी न कटवाएं (परंपरा-भेद से)
खंड-पुरश्चरण (व्यावहारिक विकल्प)
शारदातिलक: यदि एक बैठक में सम्पूर्ण पुरश्चरण संभव न हो — गुरु के मार्गदर्शन में 40 दिन, 90 दिन, या 6 माह के खंडों में विभाजित करें। प्रत्येक खंड के अंत में हवन-तर्पण अनिवार्य।





