विस्तृत उत्तर
पुरश्चरण के पाँच अंग — शास्त्रों में 'पुरश्चरण-पञ्चांग' के नाम से वर्णित:
मंत्रमहार्णव — पञ्चांग का श्लोक
जपो होमस्तर्पणं च मार्जनं ब्राह्मणार्चनम्।
पञ्चांगमेतत् पुरश्चरणस्य प्रकीर्तितम्।।'
— जप, हवन, तर्पण, मार्जन, और ब्राह्मण-अर्चन — ये पुरश्चरण के पाँच अंग हैं।
पाँचों अंगों का विस्तृत विवरण
1जप (मूल अंग — सर्वप्रमुख)
- ▸संख्या: मंत्र के अक्षर × 1,00,000
- ▸विधि: उपांशु या मानस जप सर्वोत्तम
- ▸काल: ब्रह्ममुहूर्त — प्रतिदिन एक निश्चित संख्या
- ▸महत्व: यह पुरश्चरण का प्राण है — शेष चारों अंग इसी पर आधारित हैं
2हवन (अग्नि-अंग)
- ▸संख्या: कुल जप का दशांश (10वाँ भाग)
- ▸सामग्री: देवता-अनुसार — तिल, जौ, घी, कमल-पुष्प, खीर
- ▸विधि: मंत्र के साथ 'स्वाहा' जोड़कर अग्नि में आहुति
- ▸महत्व: जप में जो अनजाने दोष हों — हवन उन्हें शुद्ध करता है। 'अग्नि' = साक्षी देवता
3तर्पण (जल-अंग)
- ▸संख्या: हवन का दशांश
- ▸विधि: हथेली से जल धारा गिराते हुए — देवता, ऋषि, पितर — तीनों को तर्पण
- ▸सामग्री: जल में तिल, जौ, कुश मिलाएं
- ▸महत्व: देवता, ऋषि, और पितरों को संतुष्ट करना — इनकी प्रसन्नता से मंत्र-सिद्धि सुगम होती है
4मार्जन (जल-छिड़काव)
- ▸संख्या: तर्पण का दशांश
- ▸विधि: कुश की शाखा से जल छिड़कना — स्वयं पर, साधना-स्थल पर, और देवता-मूर्ति पर
- ▸महत्व: शुद्धि और दोष-निवारण। जो दोष जप-हवन-तर्पण में रह जाएं — मार्जन उन्हें दूर करता है
5ब्राह्मण-अर्चन (अन्न-अंग)
- ▸संख्या: मार्जन का दशांश
- ▸विधि: ब्राह्मणों (या सुपात्र व्यक्तियों) को भोजन, वस्त्र, और दक्षिणा
- ▸महत्व: साधना का फल लोक तक पहुँचे — यही कर्म-योग है। दान के बिना साधना 'अपूर्ण' मानी जाती है
अनुपात का उदाहरण (10 लाख जप पर)
- ▸जप: 10,00,000
- ▸हवन: 1,00,000 आहुति
- ▸तर्पण: 10,000 बार
- ▸मार्जन: 1,000 बार
- ▸ब्राह्मण भोजन: 100 ब्राह्मण


