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तर्पण — प्रश्नोत्तरी

शास्त्रों और पुराणों पर आधारित प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर — कुल 19 प्रश्न

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मंत्र जप विधि

पुरश्चरण में जप-हवन-तर्पण-मार्जन का क्या क्रम है?

5 अंग: जप(मूल)→हवन(÷10)→तर्पण(÷10)→मार्जन(÷10)→भोजन/दान(÷10)। सवा लाख: 1,25,000→12,500→1,250→125→~13। पुरश्चरण = मंत्र सिद्धि — बिना = अपूर्ण।

पुरश्चरणक्रमजप
धार्मिक उपाय

पितर नाराज हों तो शांति के लिए क्या करें?

श्राद्ध/तर्पण (तिल-जल), गया पिंडदान (सबसे प्रभावी), नारायण बलि, गो-दान, ब्राह्मण भोजन, पीपल जल, कौवे को ग्रास। सबसे सरल: दक्षिण दिशा में तिल-जल + 'ॐ पितृभ्यो नमः'।

पितर शांतितर्पणश्राद्ध
कर्मकांड

पितृ तर्पण के समय कौन से मंत्रों का उच्चारण करें?

मंत्र: '(नाम) गोत्रः...तृप्यतां इदं तिलोदकं...स्वधा नमः'। सरल: 'ॐ पितृभ्यो नमः'। पितृ गायत्री। दक्षिण मुख, काले तिल+जल, दाहिने हाथ (पितृ तीर्थ), 3-3 अंजलि। जनेऊ अपसव्य। पितृ पक्ष/अमावस्या। विस्तृत = पुरोहित से सीखें।

तर्पणपितृश्राद्ध
ज्योतिष

मंत्र जप से पितृ दोष कैसे दूर होता है?

मंत्र: पितृ गायत्री, महामृत्युंजय, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय', 'ॐ पितृभ्यो नमः'। विधि: पितृ पक्ष श्राद्ध+तर्पण, अमावस्या तर्पण (तिल+जल), गया श्राद्ध सर्वश्रेष्ठ, पीपल जल, गरुड़ पुराण, अन्नदान = सबसे प्रभावी।

पितृ दोषश्राद्धतर्पण
श्राद्ध-पितृ कर्म

महालया पक्ष में पितरों के लिए पिंडदान का क्या विशेष विधान है?

महालया पिण्डदान: मृत्यु तिथि पर (अज्ञात=अमावस्या)। चावल+दूध+घी+गुड़+शहद+तिल। 12 पिण्ड। तर्पण: दक्षिण मुख, अपसव्य, तिल-जौ-कुश। पंचबलि। गया=पितृतीर्थ (108 कुल उद्धार)।

महालयापिंडदानपितृपक्ष
श्राद्ध-पितृ कर्म

अमावस्या पर तर्पण करने का क्या विशेष महत्व है?

अमावस्या तर्पण: पितृ तिथि (आत्मा निकट), चन्द्र अनुपस्थित (पितर काल), दर्शश्राद्ध (नित्य कर्तव्य), मासिक। सर्वपितृ अमावस्या=सर्वाधिक। सोमवती/भौमवती=विशेष। दक्षिण मुख→तिल-जौ-कुश→तर्पण।

अमावस्यातर्पणपितर
श्राद्ध-पितृ कर्म

तर्पण में काले तिल क्यों प्रयोग करते हैं?

काले तिल: विष्णु स्वेद से उत्पन्न (पवित्र), पाप नाशक (गरुड़ पुराण), असुर विरोधी (रक्षा), शनि सम्बद्ध (पितृ पक्ष), काला=पितृ लोक/दक्षिण/यम। सफेद तिल तर्पण में नहीं — देव कर्म में। साबुत, शुद्ध।

काले तिलतर्पणपितृ
श्राद्ध-पितृ कर्म

तर्पण करते समय कितना जल अर्पित करना चाहिए?

तर्पण जल: एक अंजलि (दोनों हथेलियाँ), प्रति पितर 3 बार। तिल+जौ+कुश अनिवार्य। पितृ तीर्थ (अंगूठा-तर्जनी बीच) से गिराएँ। धीमी धारा, भूमि/दक्षिण दिशा। नदी = सीधे जलाशय।

तर्पणजलमात्रा
व्रत

अमावस्या को पूजा करने का क्या विशेष विधान है

अमावस्या पूजा: पितृ तर्पण (तिल-जल, दक्षिण मुख) प्रमुख। श्राद्ध, गाय-कौवे-कुत्ते को भोजन। शनिश्चरी = शनि पूजा + पीपल। दान + ब्राह्मण भोजन। शुभ कार्य वर्जित। विशेष: सोमवती, शनिश्चरी, सर्वपितृ, माघ अमावस्या।

अमावस्यापितृतर्पण
श्राद्ध-पितृ कर्म

पितृ विसर्जनी अमावस्या पर तर्पण कैसे करें?

सर्वपितृ अमावस्या तर्पण: आश्विन अमावस्या (पितृ पक्ष अंतिम)। सभी पितरों हेतु। विधि: कुतप काल → दक्षिण मुख → अपसव्य → तिल-जौ-कुश-जल तर्पण (प्रति पितर 3 बार) → पिण्डदान → ब्राह्मण भोज → कौवा-गाय-कुत्ते को भोजन → दान। गया सर्वश्रेष्ठ।

सर्वपितृ अमावस्यापितृ विसर्जनीतर्पण
श्राद्ध-पितृ कर्म

महालया पक्ष में पितरों की पूजा कैसे करें?

पितृ पक्ष: भाद्रपद पूर्णिमा से अमावस्या (16 दिन)। मृत्यु तिथि पर श्राद्ध (अज्ञात हो तो अमावस्या)। विधि: दक्षिण मुख → अपसव्य जनेऊ → तिल-जौ-कुश-जल तर्पण → पिण्डदान → ब्राह्मण भोज → कौवे को भोजन → दान। गया पिण्डदान सर्वश्रेष्ठ।

महालयापितृ पक्षश्राद्ध
श्राद्ध कर्म

वार्षिक श्राद्ध कैसे करें

वार्षिक श्राद्ध: मृत्यु तिथि पर प्रतिवर्ष, कुतप काल में। विधि: संकल्प → तिल-जल तर्पण (पितृतीर्थ से) → पिण्डदान (चावल+तिल+जौ+घी) → ब्राह्मण भोजन (विषम संख्या) → दक्षिणा → कौवे-गाय-कुत्ते को भोजन → परिवार भोजन। दक्षिण दिशा मुख। पुत्र/पौत्र करे। सरल: तर्पण + गाय को रोटी + दान।

वार्षिक श्राद्धपुण्यतिथिपितृ
मंदिर संस्कार

मंदिर में पिंडदान करने का क्या विधान है?

पिंडदान: सामान्य मंदिर = अनुशंसित नहीं। विशिष्ट तीर्थ: गया विष्णुपद (सर्वोच्च), प्रयाग, काशी, रामेश्वरम। पिंड: चावल/जौ+तिल+शहद+घी। विधि: तर्पण (दक्षिण मुख) → पिंड कुश पर → मंत्र → ब्राह्मण भोजन। कब: पितृपक्ष, मृत्यु तिथि, अमावस्या। कौन: ज्येष्ठ पुत्र प्राथमिक।

पिंडदानश्राद्धपितृ कर्म
मंदिर संस्कार

मंदिर में श्राद्ध कर्म कर सकते हैं या नहीं?

सामान्यतः: मंदिर गर्भगृह में श्राद्ध (पिण्डदान) = अनुशंसित नहीं (भिन्न ऊर्जा)। अपवाद: गया विष्णुपद (श्राद्ध तीर्थ), प्रयाग, काशी — मंदिर में श्राद्ध अनुमत। मंदिर में पितर हेतु: विष्णु सहस्रनाम, गीता, अन्नदान = शुभ। श्राद्ध = घर/नदी/तीर्थ। पुरोहित से परामर्श।

श्राद्धपितर कर्ममंदिर श्राद्ध
पुरश्चरण

पुरश्चरण के दौरान तर्पण क्यों किया जाता है?

मनुस्मृति: तीन ऋण — देव (हवन), ऋषि (तर्पण-स्वाध्याय), पितृ (तर्पण-श्राद्ध)। पुरश्चरण में तर्पण: देवता-तृप्ति, ऋषि-ऋण मुक्ति, पितृ-तृप्ति (पितृ-विघ्न दूर), हवन-दोष निवारण। तर्पण विधि: देव (तीर्थ), ऋषि (किनारे), पितृ (अंगूठे से)। संख्या = हवन का 10वाँ।

तर्पणदेव तर्पणपितृ तर्पण
पुरश्चरण

पुरश्चरण के पांच अंग क्या हैं?

पुरश्चरण के पाँच अंग (मंत्रमहार्णव): जप (मूल — अक्षर × लाख), हवन (जप का 10वाँ — अग्नि में आहुति), तर्पण (हवन का 10वाँ — देव-ऋषि-पितर को जल), मार्जन (तर्पण का 10वाँ — जल-छिड़काव), ब्राह्मण अर्चन (मार्जन का 10वाँ — भोजन-दक्षिणा)। अनुपात: 10 लाख → 1 लाख → 10000 → 1000 → 100।

पुरश्चरण के अंगपंचांगहवन
धार्मिक उपाय

पितृ दोष निवारण का सबसे सरल उपाय?

सबसे सरल: दैनिक तिल-जल तर्पण (दक्षिण दिशा, 'ॐ पितृभ्यो नमः')। कौवे+गाय को रोटी। शनिवार पीपल जल। गीता 15वाँ अध्याय पाठ। बुजुर्गों की सेवा। सबसे प्रभावी: गया पिंडदान।

पितृ दोष निवारणसरल उपायतर्पण
कर्मकांड

श्राद्ध कर्म में कौन से वैदिक मंत्रों का प्रयोग होता है?

प्रमुख: पितृ सूक्त (ऋग्वेद 10.15), तर्पण मंत्र ('...स्वधा नमः'), पितृ गायत्री, गायत्री, यम सूक्त। स्वधा = पितरों हेतु (स्वाहा = देवताओं)। दक्षिण मुख, तिल+जल, अपसव्य। विद्वान ब्राह्मण से करवाएं।

श्राद्धवैदिक मंत्रपितृ
मंत्र जप विधि

सवा लाख जप करने के बाद हवन-तर्पण-मार्जन कैसे करें?

हवन: 12,500 (या 108 सरल) + 'स्वाहा' + घी। तर्पण: 1,250 (या 11) + जल। मार्जन: 125 (या 3) + कुश जल। ब्राह्मण भोजन + दान + क्षमा। पूर्णाहुति: नारियल।

सवा लाखहवनतर्पण

सनातन धर्म प्रश्नोत्तरी — शास्त्रीय ज्ञान

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