विस्तृत उत्तर
तर्पण और मार्जन मंत्र अनुष्ठान के आवश्यक अंग हैं, जो जप और हवन के पश्चात किए जाते हैं।
तर्पण' का अर्थ है तृप्त करना। इसमें मंत्र के अधिष्ठात्री देवता, ऋषियों या पितरों को अंजलि (दोनों हाथों) से जल अर्पित किया जाता है। जल में दूध या तिल मिलाकर 'ॐ अमुक देवतां तर्पयामि' कहते हुए जल पात्र में छोड़ा जाता है। अनुष्ठान का शतांश (हवन का दसवां हिस्सा) तर्पण किया जाता है।
मार्जन' का अर्थ है शारीरिक और सूक्ष्म शुद्धि। कुशा घास या आम के पत्तों से जल को अभिमंत्रित कर 'ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा...' या 'शं नो देवीरभिष्टये...' वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए उस जल को अपने सिर और शरीर पर छिड़का जाता है। मार्जन तर्पण का दशांश किया जाता है। यह प्रक्रिया शरीर के आभामंडल से सारे पापों और मलिनता को धो देती है।




