विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म में भोजन को केवल शारीरिक आवश्यकता नहीं, बल्कि ब्रह्म का स्वरूप (अन्नं ब्रह्म) माना गया है। भोजन पकाने और ग्रहण करने से पहले माता अन्नपूर्णा (जो सृष्टि का पोषण करती हैं) का स्मरण करना अन्न दोषों को दूर करता है।
भोजन शुरू करने से पूर्व दोनों हाथ जोड़कर इस श्लोक का उच्चारण करना चाहिए: 'अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे। ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥' इसका अर्थ है कि हे माता अन्नपूर्णा, जो शिव के प्राणों की वल्लभा हैं, मुझे ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए भिक्षा (भोजन) प्रदान करें। इस मंत्र के उच्चारण से भोजन प्रसाद बन जाता है, जठराग्नि संतुलित होती है और परिवार में कभी भी अन्न और धन का अभाव नहीं होता।





