विस्तृत उत्तर
विश्व को भरण-पोषण प्रदान करने के लिए माता पार्वती ने 'अन्नपूर्णा' (अन्न की देवी) का रूप धारण किया। एक बार भगवान शिव ने दार्शनिक चर्चा में कह दिया कि यह संपूर्ण भौतिक जगत (प्रकृति) और अन्न केवल 'माया' या भ्रम है।
प्रकृति स्वरूपा पार्वती इस कथन से असहमत थीं। यह सिद्ध करने के लिए कि प्रकृति मिथ्या नहीं है, उन्होंने स्वयं को ब्रह्मांड से विलुप्त कर लिया। शक्ति के विलुप्त होते ही संपूर्ण जगत में भयंकर अकाल पड़ गया।
हाहाकार मचने पर, शिव ने अपनी लीला समाप्त की और काशी में भिक्षुक बनकर माता अन्नपूर्णा से भिक्षा माँगी। तब माता ने सिद्ध किया कि भौतिक शरीर के अस्तित्व और चेतना के विकास के लिए 'अन्न' और 'प्रकृति' सत्य हैं।





