विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म में भोजन को देवता माना गया है और भोजन से पूर्व ईश्वर को अर्पित करके ग्रहण करने की परम्परा है।
प्रमुख भोजन मंत्र
1ब्रह्मार्पणम् (भगवद्गीता 4.24)
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥'
अर्थ: अर्पण (स्रुवा आदि) ब्रह्म है, हवि (आहुति का द्रव्य) ब्रह्म है, ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता द्वारा हवन करना ब्रह्म है, और प्राप्त फल भी ब्रह्म ही है।
2सहनाववतु (कठोपनिषद् शान्ति मंत्र)
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥'
अर्थ: ईश्वर हम दोनों (गुरु-शिष्य) की रक्षा करें, हमारा पोषण करें, हम मिलकर बड़ा पराक्रम करें, हमारी बुद्धि तेजस्वी हो, हम परस्पर द्वेष न करें। शान्ति, शान्ति, शान्ति।
3अन्नब्रह्म मंत्र
अन्नब्रह्मा रसो विष्णुः भोक्ता देवो महेश्वरः।
एवं ज्ञात्वा तु यो भुंक्ते अन्नदोषो न लिप्यते॥'
अर्थ: अन्न में ब्रह्मा, रस में विष्णु, और भोक्ता में महेश्वर हैं। ऐसा जानकर भोजन करने से अन्न के दोष नहीं लगते।
4अन्नपूर्णा स्तोत्र
अन्नपूर्णे सदा पूर्णे शंकरप्राणवल्लभे।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥'
अर्थ: हे सदा पूर्ण अन्नपूर्णा, शंकर की प्रिय पार्वती, ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए भिक्षा दें।
5पञ्चप्राण आहुति
परम्परागत रूप से पहली पाँच ग्रास से पञ्च प्राणों को आहुति दी जाती है: 'ॐ प्राणाय स्वाहा', 'ॐ अपानाय स्वाहा', 'ॐ समानाय स्वाहा', 'ॐ उदानाय स्वाहा', 'ॐ व्यानाय स्वाहा'।
भोजन के नियम (शास्त्र अनुसार)
- ▸5 अंगों (2 हाथ, 2 पैर, मुख) को धोकर भोजन करें।
- ▸पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- ▸भूमि पर पालथी मारकर बैठना उत्तम।
- ▸क्रोध में भोजन न बनाएँ, न करें।





