विस्तृत उत्तर
सूर्य को जल अर्पित करना (सूर्य अर्घ्य) सनातन धर्म की प्राचीन दैनिक उपासना है। शास्त्रों में इसे अत्यन्त पुण्यदायी और ग्रह दोष निवारक बताया गया है।
विधि
1समय
सूर्योदय के समय (सूर्योदय के एक घंटे के भीतर) अर्घ्य देना सर्वोत्तम है।
2पात्र
सदैव तांबे के लोटे का प्रयोग करें। तांबा सूर्य की धातु है, अतः तांबे से जल देने पर सूर्य ऊर्जा का विशेष प्रभाव होता है।
3जल में सामग्री
तांबे के लोटे में शुद्ध जल भरकर उसमें मिलाएँ: लाल फूल, लाल चन्दन (एक चुटकी), कुमकुम (रोली), अक्षत (चावल)।
4दिशा
पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े हों (सूर्य की ओर)। खुले स्थान या छत पर जाएँ।
5अर्घ्य देना
दोनों हाथों से लोटा पकड़कर धीरे-धीरे जल की धारा सूर्य की ओर ऊपर उठाते हुए अर्पित करें। जल की गिरती धारा से सूर्य किरणों को देखना शुभ माना जाता है।
6मंत्र
जल अर्पित करते हुए इनमें से किसी मंत्र का जप करें:
- ▸'ॐ सूर्याय नमः'
- ▸'ॐ घृणि सूर्याय नमः' (सूर्य बीज मंत्र)
- ▸'ॐ आदित्याय नमः'
- ▸गायत्री मंत्र: 'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्'
सूर्य अर्घ्य विशेष मंत्र
ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकरः॥
7स्नान के बाद
जो जल भूमि पर गिरे, उसे मस्तक पर लगाएँ।
सावधानियाँ
- ▸प्रतिदिन एक ही समय पर अर्घ्य दें।
- ▸बासी जल न चढ़ाएँ।
- ▸नियमितता बनाए रखें — शुरू करें तो छोड़ें नहीं।
फल
आत्मविश्वास, मान-सम्मान, तेज वृद्धि, कुण्डली में सूर्य बलवान, नेत्र रोग शमन, और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्ति।





