विस्तृत उत्तर
हिन्दू धर्म में भोजन से पूर्व और बाद दोनों समय मंत्रोच्चार का विधान है।
भोजन से पूर्व
ॐ अन्नपते अन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः। प्र प्र दातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे।
या सरल मंत्र: 'ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।' (गीता 4.24)
भोजन के बाद (भोजनोत्तर मंत्र)
1कृतज्ञता मंत्र
अन्नदाता सुखी भव।' (अन्न देने वाला सुखी रहे।)
2अघोर मंत्र/पचन मंत्र
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।' (भोजन के अंत में जल पीते समय)
3विष्णु स्मरण
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।' भोजन के बाद भगवान का स्मरण।
4अग्नि तृप्ति मंत्र
भोजन से पूर्व पाँच ग्रास (प्राणाहुति) — 'ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा।' यह पंचप्राण आहुति है।
5भोजन समाप्ति
अतिथि देवो भव।' (अतिथि को देवता समझें।)
भोजन के बाद मुख धोएँ, आचमन करें।
भोजन के सामान्य नियम
- ▸मौन भोजन श्रेष्ठ, या देव-स्मरण करते हुए।
- ▸पूर्व या उत्तर दिशा में मुख करके बैठें।
- ▸भोजन से पहले अन्न में से एक भाग गाय, कुत्ता, कौवा, अग्नि और अतिथि के लिए निकालें (पंचबलि/वैश्वदेव)।





