विस्तृत उत्तर
सनातन परंपरा में भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि ब्रह्म का स्वरूप (अन्नं ब्रह्म) माना गया है। भोजन पकाने वाले की भावना या अन्न के स्रोत से जुड़े सूक्ष्म दोषों को नष्ट करने के लिए भोजन ग्रहण करने से पूर्व मंत्र उच्चारण का कड़ा विधान है।
भोजन शुद्धि के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय का 24वां श्लोक सर्वश्रेष्ठ माना गया है—'ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥' इस श्लोक का अर्थ है कि अर्पण करने की क्रिया ब्रह्म है, हवि (अन्न) ब्रह्म है, और ग्रहण करने वाला भी ब्रह्म है। इसके उच्चारण से भोजन के सभी दोष नष्ट हो जाते हैं और वह ईश्वरीय 'प्रसाद' बन जाता है, जो शरीर को रोगमुक्त और मन को सात्विक रखता है।




