विस्तृत उत्तर
महर्लोक के निवासी सामान्य अन्न या जल पर निर्भर नहीं रहते। यहाँ के ऋषि और सिद्ध योगी योग-अग्नि और परब्रह्म के ध्यान से ही पोषण प्राप्त करते हैं। यह लोक पूर्ण रूप से विशुद्ध सत्त्व गुण से आच्छादित है इसलिए यहाँ के निवासियों को भौतिक भोजन की आवश्यकता ही नहीं होती। यहाँ के निवासी अपनी चेतना को इतना परिष्कृत कर चुके होते हैं कि वे ब्रह्माण्डीय ऊर्जा और परब्रह्म के ध्यान से ही जीवन धारण करते हैं। यहाँ भौतिक जगत के किसी भी विकार जैसे क्षुधा (भूख) का पूर्णतः अभाव है। महर्लोक की भौतिक संरचना भी स्वर्णिम या किसी पार्थिव धातु की न होकर विशुद्ध चिन्मय और मनोमय तत्त्वों से निर्मित मानी गई है।
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