विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत के भोजन का वर्णन पिंडदान के संदर्भ में विस्तार से किया गया है।
पिंडदान ही भोजन — गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि मृत्यु के बाद दस दिनों तक परिजनों द्वारा दिया गया पिंडदान प्रेत के लिए भोजन का कार्य करता है। 'प्रत्यहं ते विभाज्यन्ते चतुर्भागैः' — अर्थात् प्रत्येक दिन का पिंड चार भागों में विभाजित होता है — शरीर-निर्माण के दो भाग, यमदूतों के लिए एक भाग और जीव के लिए एक भाग।
तेरहवें दिन का पिंड — यह पिंड प्रेत को यमलोक की यात्रा के लिए शक्ति देता है।
श्राद्ध में भोजन — वार्षिक श्राद्ध में भी जो भोजन और अन्न ब्राह्मणों को दिया जाता है, वह प्रेत और पितरों को पहुँचता है।
तर्पण — जल और तिल से किया गया तर्पण प्रेत की तृप्ति के लिए होता है।
पिंडदान न मिलने पर — जिसका पिंडदान नहीं होता, उसे भोजन नहीं मिलता। वह भूखा-प्यासा भटकता रहता है। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'जिनका पिंडदान नहीं होता, वे कल्पान्त तक प्रेत बनकर निर्जन वन में भ्रमण करते रहते हैं।'





