विस्तृत उत्तर
पुरश्चरण में मंत्र-चयन — सबसे महत्वपूर्ण और सावधानी से करने वाला निर्णय:
कुलार्णव तंत्र (15.56) — मंत्र-चयन का मूल नियम
गुरुदत्तं मंत्रमेव पुरश्चरणे जपेत्।
स्वेच्छया मंत्रग्रहणं निष्फलं परिकीर्तितम्।।'
— पुरश्चरण में केवल गुरु-दत्त मंत्र जपें। अपनी इच्छा से लिया मंत्र पुरश्चरण में निष्फल कहा गया है।
पुरश्चरण के लिए उपयुक्त मंत्र — तीन शर्तें
- 1गुरु-दीक्षित — गुरु ने स्वयं दिया हो
- 2देवता-अनुसार — इष्टदेव का मंत्र हो
- 3शास्त्र-सम्मत — प्रामाणिक ग्रंथों में वर्णित
प्रमुख पुरश्चरण-योग्य मंत्र (मंत्रमहार्णव)
1गायत्री मंत्र (सर्वश्रेष्ठ — 24 अक्षर = 24 लाख जप)
सभी साधकों के लिए उपयुक्त। 'सर्वमंत्राणां जननी।' — यह मंत्र-सिद्धि के बाद अन्य मंत्रों की सिद्धि सरल होती है।
2पंचाक्षर मंत्र 'नमः शिवाय' (5 अक्षर = 5 लाख)
शिव-भक्तों के लिए। शिव पुराण: पंचाक्षर = शिव का मूल मंत्र।
3अष्टाक्षर मंत्र 'ॐ नमो नारायणाय' (8 अक्षर = 8 लाख)
वैष्णवों के लिए। पाञ्चरात्र आगम में सर्वोच्च।
4द्वादशाक्षर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' (12 अक्षर = 12 लाख)
भागवत-परंपरा में प्रचलित।
5नवार्ण मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' (9 = 9 लाख)
शाक्त-परंपरा में — दुर्गा-सप्तशती का मूल मंत्र।
6महामृत्युंजय (33 अक्षर = 33 लाख)
संकट-निवारण, रोग-मुक्ति, और दीर्घायु के लिए।
मंत्र-चयन में सावधानी
शारदातिलक: एक पुरश्चरण में केवल एक ही मंत्र — बीच में न बदलें। जन्म-राशि, इष्टदेव, और कुंडली के आधार पर गुरु उचित मंत्र बताते हैं।





