विस्तृत उत्तर
पुरश्चरण में तर्पण की अनिवार्यता और शास्त्रीय महत्व:
तर्पण की परिभाषा (मंत्रमहार्णव)
तृप्यन्ति येन देवाश्च ऋषयः पितरस्तथा।
तर्पणं तद्विजानीयात् मंत्रसिद्धौ विधीयते।।'
— जिससे देव, ऋषि, और पितर तृप्त होते हैं — वह तर्पण है। यह मंत्र-सिद्धि में विहित है।
तर्पण क्यों अनिवार्य — तीन ऋणों का सिद्धांत
मनुस्मृति (3.70-72): मनुष्य तीन ऋणों के साथ जन्म लेता है:
- 1देव-ऋण — यज्ञ-हवन से चुकाया जाता है
- 2ऋषि-ऋण — स्वाध्याय और मंत्र-जप से (और ऋषि-तर्पण से)
- 3पितृ-ऋण — श्राद्ध और पितृ-तर्पण से
पुरश्चरण में तर्पण इन तीनों ऋणों को चुकाने का माध्यम है। जब तक ये ऋण हैं — साधना में बाधाएं आती हैं।
पुरश्चरण में तर्पण क्यों — पाँच कारण
1देवता-तृप्ति
तर्पण से देवता जल-ग्रहण करते हैं और प्रसन्न होते हैं — उनकी प्रसन्नता से मंत्र-सिद्धि शीघ्र होती है।
2ऋषि-ऋण मुक्ति
याज्ञवल्क्य स्मृति: मंत्र की रचना ऋषियों ने की — उन्हें तर्पण देना = मंत्र-स्रोत का सम्मान करना। ऋषि प्रसन्न हों तो मंत्र की शक्ति बढ़ती है।
3पितृ-तृप्ति
कुलार्णव (15.76): असंतुष्ट पितर साधना में 'विघ्न' डाल सकते हैं। पितृ-तर्पण से वे तृप्त होते हैं और साधना में आशीर्वाद देते हैं।
4जल-तत्व का अर्पण
अग्निपुराण: तर्पण = जल-तत्व के माध्यम से देवशक्ति का स्मरण और संतुष्टि। पाँच तत्वों में जल = भावनाओं और शुद्धि का तत्व।
5हवन-दोष निवारण
मंत्रमहार्णव: हवन में यदि कोई त्रुटि हो — तर्पण उसे शुद्ध करता है।
तर्पण की विधि
- ▸हथेली से जल की धारा गिराएं — तीन प्रकार अलग-अलग:
- ▸देव-तर्पण: हथेली के सामने के भाग से (तीर्थ)
- ▸ऋषि-तर्पण: हथेली के किनारे से
- ▸पितृ-तर्पण: अंगूठे की ओर से (पितृ-तीर्थ)
- ▸जल में तिल, जौ, कुश, और पुष्प मिलाएं।
- ▸प्रत्येक नाम लेते हुए: 'अमुकाय तृप्यतां स्वधा।'
संख्या: हवन का 10वाँ भाग = तर्पण की संख्या।





