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पुरश्चरण📜 मंत्रमहार्णव, मनुस्मृति (3.70-72), याज्ञवल्क्य स्मृति, कुलार्णव तंत्र (15.76), अग्निपुराण2 मिनट पठन

पुरश्चरण के दौरान तर्पण क्यों किया जाता है?

संक्षिप्त उत्तर

मनुस्मृति: तीन ऋण — देव (हवन), ऋषि (तर्पण-स्वाध्याय), पितृ (तर्पण-श्राद्ध)। पुरश्चरण में तर्पण: देवता-तृप्ति, ऋषि-ऋण मुक्ति, पितृ-तृप्ति (पितृ-विघ्न दूर), हवन-दोष निवारण। तर्पण विधि: देव (तीर्थ), ऋषि (किनारे), पितृ (अंगूठे से)। संख्या = हवन का 10वाँ।

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विस्तृत उत्तर

पुरश्चरण में तर्पण की अनिवार्यता और शास्त्रीय महत्व:

तर्पण की परिभाषा (मंत्रमहार्णव)

तृप्यन्ति येन देवाश्च ऋषयः पितरस्तथा।

तर्पणं तद्विजानीयात् मंत्रसिद्धौ विधीयते।।'

— जिससे देव, ऋषि, और पितर तृप्त होते हैं — वह तर्पण है। यह मंत्र-सिद्धि में विहित है।

तर्पण क्यों अनिवार्य — तीन ऋणों का सिद्धांत

मनुस्मृति (3.70-72): मनुष्य तीन ऋणों के साथ जन्म लेता है:

  1. 1देव-ऋण — यज्ञ-हवन से चुकाया जाता है
  2. 2ऋषि-ऋण — स्वाध्याय और मंत्र-जप से (और ऋषि-तर्पण से)
  3. 3पितृ-ऋण — श्राद्ध और पितृ-तर्पण से

पुरश्चरण में तर्पण इन तीनों ऋणों को चुकाने का माध्यम है। जब तक ये ऋण हैं — साधना में बाधाएं आती हैं।

पुरश्चरण में तर्पण क्यों — पाँच कारण

1देवता-तृप्ति

तर्पण से देवता जल-ग्रहण करते हैं और प्रसन्न होते हैं — उनकी प्रसन्नता से मंत्र-सिद्धि शीघ्र होती है।

2ऋषि-ऋण मुक्ति

याज्ञवल्क्य स्मृति: मंत्र की रचना ऋषियों ने की — उन्हें तर्पण देना = मंत्र-स्रोत का सम्मान करना। ऋषि प्रसन्न हों तो मंत्र की शक्ति बढ़ती है।

3पितृ-तृप्ति

कुलार्णव (15.76): असंतुष्ट पितर साधना में 'विघ्न' डाल सकते हैं। पितृ-तर्पण से वे तृप्त होते हैं और साधना में आशीर्वाद देते हैं।

4जल-तत्व का अर्पण

अग्निपुराण: तर्पण = जल-तत्व के माध्यम से देवशक्ति का स्मरण और संतुष्टि। पाँच तत्वों में जल = भावनाओं और शुद्धि का तत्व।

5हवन-दोष निवारण

मंत्रमहार्णव: हवन में यदि कोई त्रुटि हो — तर्पण उसे शुद्ध करता है।

तर्पण की विधि

  • हथेली से जल की धारा गिराएं — तीन प्रकार अलग-अलग:
  • देव-तर्पण: हथेली के सामने के भाग से (तीर्थ)
  • ऋषि-तर्पण: हथेली के किनारे से
  • पितृ-तर्पण: अंगूठे की ओर से (पितृ-तीर्थ)
  • जल में तिल, जौ, कुश, और पुष्प मिलाएं।
  • प्रत्येक नाम लेते हुए: 'अमुकाय तृप्यतां स्वधा।'

संख्या: हवन का 10वाँ भाग = तर्पण की संख्या।

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शास्त्रीय स्रोत
मंत्रमहार्णव, मनुस्मृति (3.70-72), याज्ञवल्क्य स्मृति, कुलार्णव तंत्र (15.76), अग्निपुराण
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