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पुरश्चरण📜 मंत्रमहार्णव, कुलार्णव तंत्र (15.68-72), भागवत पुराण (6.1.13-15), भगवद्गीता (10.25), तंत्रसार2 मिनट पठन

पुरश्चरण में जप का महत्व क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

गीता (10.25): 'सभी यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ।' पुरश्चरण में जप = प्राण (शेष चारों अंग जप-संख्या पर निर्भर)। जप = नाद-संचय (लाखों ऊर्जा-इकाइयाँ)। भाव-सहित जप > यंत्रवत् जप। एक दिन छूटे = पुरश्चरण खंडित = पुनः आरंभ। पुरश्चरण में मानस जप सर्वोत्तम।

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विस्तृत उत्तर

पुरश्चरण में जप की केंद्रीय भूमिका और उसका महत्व:

भगवद्गीता (10.25) — जप की सर्वोच्चता

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि।

— भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं: 'सभी यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ।' यह पुरश्चरण में जप की सर्वोच्चता का शास्त्रोक्त प्रमाण है।

पुरश्चरण में जप क्यों सर्वप्रमुख है

1जप = पुरश्चरण का प्राण

मंत्रमहार्णव: शेष चारों अंग (हवन, तर्पण, मार्जन, ब्राह्मण-भोजन) जप की संख्या के दशांश पर निर्भर हैं। जप के बिना शेष अंग निरर्थक हैं — जैसे आत्मा बिना शरीर।

2जप = मंत्र-बीज का अंकुरण

कुलार्णव तंत्र (15.68): पुरश्चरण में नियमित जप से मंत्र-बीज भूमि में गहरा जाता है। जितना अधिक जप — उतना गहरा अंकुरण — उतनी शक्तिशाली सिद्धि।

3जप = नाद-संचय

तंत्रसार: प्रत्येक जप में मंत्र की नाद-ऊर्जा साधक के भीतर संचित होती है। लाखों जप = लाखों ऊर्जा-इकाइयों का संचय। यह संचित नाद-ऊर्जा ही 'सिद्धि' के रूप में प्रकट होती है।

4जप = दोष-नाशक

भागवत (6.1.13): 'संकीर्त्य नारायणशब्दमात्रं।' — एक नाम-उच्चारण से असंख्य पाप नष्ट। फिर लाखों जप का दोष-नाशक प्रभाव अकल्पनीय है।

5जप की संख्या और गुण — दोनों महत्वपूर्ण

मंत्रमहार्णव:

  • संख्या-पूर्ति = पुरश्चरण की बाह्य पूर्णता
  • ध्यान-सहित जप = पुरश्चरण की आंतरिक पूर्णता

केवल संख्या पूरी करना — 'यंत्रवत् जप' — से सिद्धि नहीं। भाव-सहित जप ही फलदायी है।

6पुरश्चरण में जप की विशेष विधि

कुलार्णव: पुरश्चरण-जप में मानस जप (मन में) सर्वोत्तम। उपांशु (फुसफुसाहट) मध्यम। वाचिक (मुख से) न्यूनतम।

पुरश्चरण में एक माला में एक ही प्रकार का जप — बीच में न बदलें।

जप छूट जाए तो

कुलार्णव (15.72): 'खंडितं पुरश्चरणं पुनः कुर्यात् समारभेत्।'

— यदि एक दिन भी जप छूटे — पुरश्चरण खंडित माना जाता है। पुनः आरंभ करना पड़ता है। इसलिए प्रारंभ से पूर्व पर्याप्त तैयारी करें।

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शास्त्रीय स्रोत
मंत्रमहार्णव, कुलार्णव तंत्र (15.68-72), भागवत पुराण (6.1.13-15), भगवद्गीता (10.25), तंत्रसार
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